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मेरी फिल्म से लोगों की सोच बदलेगी!

मेरी फिल्म से लोगों की सोच बदलेगी!

‘यहां’ जैसी संवेदनशील फिल्म से चर्चा में आए निर्देशक सुजीत सरकार पूरे पांच साल बाद ‘विक्की डोनर’ लेकर आए हैं। इस फिल्म का सबजेक्ट काफी बोल्ड है, इतना बोल्ड कि अमूमन लोग इस पर बात भी नहीं करते। लेकिन यह भी सच है कि चुपचाप स्पर्म दान करने वालों की संख्या देश में तेजी से बढ़ रही है। आम युवा से लेकर सोसायटी के हाई प्रोफाइल लोग तक स्पर्म दान करते हैं। समाज के इसी विरोधाभास ने सुजीत को इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुभव उन्हीं के शब्दों में:

‘यहां’ के बाद..
फिल्म ‘यहां’ के बाद मैंने ‘जॉनी मस्ताना’ भी बनाई, जो रिलीज नहीं हो पाई। कई दूसरी फिल्मों की भी पटकथाएं लिख रखी हैं। एक पटकथा पर बहुत जल्द फिल्म बननी शुरू होगी।

‘विक्की डोनर’ नई तरह की फिल्म
दरअसल 1982 से 2002 तक की रिसर्च के अनुसार स्पर्म दान करने वालों की बढ़ती संख्या के चलते नि:संतान दंपतियों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। मैं स्पर्म दान को बहुत बड़ा मानवीय कर्म मानता हूं। लेकिन अब तक हमारे देश में इस विषय पर कोई अच्छी फिल्म नहीं बनी है, इसलिए मैंने यह फिल्म बनाने का निर्णय लिया। मैं नया काम करने में ही यकीन करता हूं। मेरी फिल्म ‘विक्की डोनर’ बॉलीवुड में नई तरह की फिल्म है। वैसे यह विषय फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी के ही दिमाग की उपज है। उसने मुझे एक दिन ‘स्पर्म डोनेशन’ पर फिल्म बनाने का आइडिया दिया। फिर हम दोनों ने मिल कर इस पर काम किया। अगर यही विषय मुझे किसी पुरुष लेखक ने सुझाया होता तो शायद मैं इस पर काम करने से पहले दो बार सोचता।

मैंने इस विषय को बड़े ह्यूमरस तरीके से पेश किया है, लेकिन यह ध्यान भी रखा है कि फिल्म देखने के बाद हर इंसान स्पर्म डोनेट करने के लिए प्रेरित हो। फिल्म में घटिया और दो मानी संवाद नहीं हैं। हमने फिल्म को तथ्यपरक बनाने के लिए भारत खासकर मुंबई में स्पर्म बैंक की शुरुआत करने वाले डॉ. अनिरुद्घ मालपानी की सेवाएं ली हैं। पहली बार ऐसा हो रहा है, जब हम स्पर्म डोनेशन पर इतने बड़े माध्यम से बात कर रहे हैं। हमारे यहां स्पर्म डोनेशन कानूनी तौर पर वैध है, फिर भी लोग इस पर खुल कर बात करने से कतराते हैं। उम्मीद है कि हमारी फिल्म देखने के बाद आम लोगों की सोच बदलेगी।

जॉन अब्राहम बने प्रोडय़ूसर
सच तो यह है कि जॉन अब्राहम के साथ किसी अन्य विषय वाली फिल्म को लेकर चर्चा चल रही थी। मैंने ‘विक्की डोनर’ की कहानी राम मीरचंदानी को सुनाई थी। उन्होंने कहा कि मैं यह कहानी जॉन अब्राहम को भी सुनाऊं, क्योंकि वह कुछ अलग तरह की फिल्म के निर्माण के साथ अपने बैनर की शुरुआत करना चाहते हैं। जॉन अब्राहम को फिल्म की पटकथा पसंद आ गई और वह इस पर फिल्म बनाने के लिए तैयार हो गए। जॉन अब्राहम ने सिर्फ इसका निर्माण ही नहीं किया, बल्कि फिल्म को लोगों तक पहुंचाने के लिए इसके प्रमोशनल वीडियो में काम भी किया और देश के कई कोनों में जा कर इस फिल्म को प्रमोट भी किया।

सिर्फ युवाओं की फिल्म नहीं है यह
सच कहूं तो यह फिल्म हर उम्र के लोगों के लिए है। इसे पूरा परिवार एक साथ बैठ कर देख सकता है। मेरा मानना है कि युवा पीढ़ी फिल्म देखने के बाद अपने माता-पिता को यह फिल्म देखने के लिए भेजेगी।

कहानी की मांग थे नए कलाकार
स्थापित कलाकारों को लेकर फिल्म बनाने पर विषय का महत्व गड़बड़ा जाता। पटकथा लिखते समय ही मेरे दिमाग में यह बात साफ थी कि नए कलाकारों के साथ ही बेहतर प्रभाव बन सकता है। आयुष्मान खुराना और यामी गौतम दोनों ने बहुत अच्छा काम किया है और हम बहुत जल्दी इन्हें लेकर दूसरी फिल्म भी बनाने वाले हैं, जबकि डॉ. चड्ढा के किरदार के लिए  हमने अनु कपूर को लिया है। मेरा दावा है कि इस किरदार को अनु कपूर से बेहतर कोई दूसरा कलाकार निभा ही नहीं सकता था।

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