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टकराव किसी मर्ज की दवा नहीं

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बीच बातचीत माहौल बेहतर करने के मोर्चे पर एक नए अध्याय की शुरुआत है। टकराव किसी मर्ज की दवा नहीं हो सकती है। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने समय रहते एक अच्छी पहल की। नीतीश कुमार ने भी दौरे का मकसद बताकर उन्हें आश्वस्त कर दिया।

दरअसल मनसे प्रमुख के गुरुवार के बयान से माहौल में तल्खी पैदा हो गई थी। नीतीश कुमार ने इसके बावजूद शुक्रवार की सुबह संजीदा बयान दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके मन में महाराष्ट्र और वहां के महापुरुषों के प्रति पूरा सम्मान है। वहां पहुंचकर वह सबसे पहले महाराष्ट्र की धरती को प्रणाम करेंगे।

महाराष्ट्र में बिहार के लोग बड़ी संख्या में रोजगार और उद्यम करते हैं। मुख्यमंत्री की चिंता उनकी हिफाजत भी थी। माहौल में तल्खी से वहां रह रहे बिहारी असुरक्षित महसूस करते हैं। बड़ी संख्या में मजदूरों की दिहारी मारी जाती है। मनसे का लक्ष्य मराठी आकांक्षाओं को उभार देकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना है।

मनसे अपने इस एजेंडे पर कायम रहे तो भला किसे आपत्ति होगी। लेकिन बात जब इस बहाने दूसरों को लक्ष्य करने की होती है, तो इसमें महाराष्ट्र के भले की बात पीछे छूट जाती है और वहां भय का वातावरण बन जाता है। बिहार के लोगों को महाराष्ट्र में रोजगार मिला तो, बिहारियों ने महाराष्ट्र के निर्माण में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब अगर वहां के नव निर्माण की बात होती है, तो बिहार के लोग भला इसमें पीछे क्यों हटेंगे। लेकिन इस बहाने नफरत और टकराव की राजनीति को कैसे जायज ठहराया जा सकता है। महाराष्ट्र की जनता भी इसे पसंद नहीं करती। बीते विधान सभा चुनावों के नतीजे इसके प्रमाण हैं।

बहरहाल, राज ठाकरे ने चाहे जिस संदर्भ या मकसद से गुरुवार को मुख्यमंत्री की मुंबई यात्रा पर धमकी भरा बयान दिया, लेकिन नीतीश कुमार ने शुक्रवार की सुबह इसके बावजूद पूरी संजीदगी दिखाई। जद यू नेता और एमएलसी देवेशचन्द्र ठाकुर ने शुक्रवार की दोपहर मनसे प्रमुख से मुलाकात कर मुख्यमंत्री के दौरे का मकसद उन्हें बताया।

इसके बाद राज ठाकरे ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से फोन पर बातचीत की। ठाकरे ने बातचीत में न केवल इस संदर्भ में पूर्व में दिया अपना बयान वापस ले लिया, बल्कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में हो रहे विकास को भी सराहा। वह पहले भी नीतीश कुमार के प्रयासों और कार्यो की सराहना करते रहे हैं।

बिहार के तमाम राजनीतिक दलों, संगठनों और यहां की जनता ने भी पूरी संजीदगी दिखाई। इससे दोनों राज्यों के लोगों में पैदा हो रहे संशय पर विराम लगेगा। राजनीति में अलग-अलग दलों और संगठनों की अपनी प्रतिबद्धता होती है और इस नाते वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन लक्ष्य तो अपने-अपने रास्ते लोगों का भला ही हो सकता है, तभी उसे जन समर्थन भी हासिल होगा। इस नई पहल को नए अध्याय की शुरुआत कहा जा सकता है।

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