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ओडे हत्याकांड में 18 आरोपियों को उम्रकैद की सजा

ओडे हत्याकांड में 18 आरोपियों को उम्रकैद की सजा

आणंद की एक सुनवाई अदालत ने वर्ष 2002 में गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान गुजरात के ओडे गांव में 23 लोगों के नरसंहार के मामले में गुरुवार को 18 लोगों को आजीवन कारावास और पांच अन्य को सात-सात वर्ष जेल की सजा सुनाई।
     
जिला एवं सत्र न्यायाधीश पूनम सिंह ने गुरुवार को यह सजा सुनाई। न्यायाधीश ने इससे पहले गत सोमवार को 18 लोगों को हत्या और आपराधिक षडयंत्र का दोषी पाने के साथ ही पांच अन्य को हत्या का प्रयास करने एवं आपराधिक षडयंत्र रचने का दोषी पाया था।
     
अदालत ने इसके साथ ही आजीवन कारावास पाये प्रत्येक व्यक्ति पर 5800 रुपये का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही अदालत ने सात वर्ष जेल की सजा पाये प्रत्येक व्यक्ति पर 3800 रुपये का जुर्माना लगाया।
     
सजा सुनाये जाने के साथ ही अदालत परिसर में मौजूद दोषियों के परिवार के सदस्यों में कोहराम मच गया और कई तो रो पड़े। रिश्तेदारों ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। यह अन्याय है।
      
अदालत परिसर में महिलाओं और बच्चों सहित मौजूद 100 से अधिक लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी। हालांकि पुलिस ने उन्हें परिसर से हटाया।
      
उल्लेखनीय है कि गोधरा ट्रेन अग्निकांड की घटना के बाद गुजरात राज्य में हुए दंगे के दौरान 1500 से अधिक लोगों की भीड़ ने एक मार्च 2002 को ओडे गांव के पीरवाली भगोल क्षेत्र स्थित एक घर में नौ महिलाओं और उतने ही बच्चों सहित 23 लोगों को जिंदा जला दिया था।
      
कुल 47 आरोपियों में से अदालत ने 23 लोगों को दोषी करार दिया था जबकि इतनों ही को बरी कर दिया था। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई।

गुजरात में आणंद स्थित एक अदालत ने वर्ष 2002 के गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद हुए दंगों के दौरान ओडे गांव में हुए हत्याकांड मामले में सोमवार को 23 लोगों को दोषी ठहराने के साथ ही सबूत के अभाव में इतने ही लोगों को बरी कर दिया था।
 
दंगा मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने की। गोधरा ट्रेन अग्निकांड की घटना के बाद एक मार्च 2002 को ओडे गांव के पिरावली भगोल क्षेत्र में स्थित एक घर में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं और बच्चों सहित 23 लोगों को जिंदा जला दिया गया था।
 
इस मामले में कुल मिलाकर 47 लोग आरोपी थे लेकिन सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई थी। विशेष लोक अभियोजक पी एन परमार ने कहा कि 150 गवाहों की गवाही हो चुकी है तथा 170 से अधिक दस्तावेजी साक्ष्य अदालत के समक्ष रखे गए हैं।
 
इसकी सुनवाई वर्ष 2009 के अंत में शुरू हुई थी। मामले की सुनवायी पूरी होने को थी लेकिन इसी दौरान सुनवायी करने वाले न्यायाधीश ने मई 2011 में व्यक्तिगत कारण बताते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद इस मामले में सिंह को न्यायाधीश नियुक्त किया गया और उनके समक्ष सभी जिरह फिर से हुई।

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