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सेनापति के नाम पर उलझा नेपाल

नेपाल के प्रधान सेनापति रुक्मांगद कटवाल बहुत अच्छा गाते हैं, यह कम लोगों को पता होगा। इसे बताने के लिए जो चंद लोग रह गये हैं, वो उस ज़माने को याद करते हैं, जब राजा महेंद्र की सवारी ओखलढुंगा आई थी। बालक रुक्मांगद द्वारा गाये प्रशस्ति गान से विभोर राजा महेंद्र ने उन्हें गोद में उठा लिया था। रुक्मांगद की पढ़ाई-लिखाई और उनके करियर की जि़म्मेदारी दरबार की थी। महल के प्रति प्रतिबद्ध ठकुरी, मल्ल, राणा, क्षेत्री जैसी जो नस्लें नेपाल की ‘एलीट फोर्स’ मानी जाती हैं, रुक्मांगद उन्हीं की रहनुमाई कर रहे थे। लेकिन रुक्मांगद कटवाल को पदोन्नति का पर्वतारोहण कराने में अकेले महल की भूमिका नहीं रही थी। कटवाल को कार्यवाहक प्रधान सेनापति कोइराला ने बनाया था। वह भी तब, जब उनके खिलाफ मानवाधिकार हनन का मामला चल रहा था। तत्कालीन नरश ज्ञानेंद्र के विरुद्ध 22 अप्रैल 2006 को काठमांडू में हुए प्रदर्शन में 21 लोग मारे गये थे, और कोई 3,000 लोग घायल हुए थे। कटवाल ने जांच कमीशन के आगे एकमात्र तर्क दिया कि मैं सरकारी आदेश का पालन कर रहा था। आज यही कटवाल हैं, जिन पर सरकारी आदेश न मानन का आरोप लगा है। कटवाल के खिलाफ लगातार तीन बार अवज्ञा किये जान के संगीन आरोप लगे हैं। पहला, उन्होंने मंत्रालय के आदेशों को ताक पर रखते हुए 2884 नई नियुक्ितयां कीं। दूसरा, सेना के आठ ब्रिगेडियर जनरलों की सेवा अवधि बढ़ाई। और तीसरा गुनाह ये था कि कटवाल ने पांचवे राष्ट्रीय खेल में माओवादी लड़ाकों द्वारा भाग लेन के सवाल पर सेना की सहभागिता से मना कर दिया था। इससे पहल कटवाल कई मौकों पर कह चुके थे कि 1हज़ार माओवादी लड़ाकों का किसी भी क़ीमत पर सेना में समायोजन नहीं होगा। कटवाल से जवाब-तलबी हुई और इसी बिना पर उन्हें बखऱ्ास्त किये जान का फैसला माओवादी आलाकमान न कर लिया। जिस तरह स कटवाल के बहाने 25 में से 15 पार्टियां संसद में नेपाली कांग्रेस के साथ कंधे स कंधा मिला रही हैं, उससे इतनी बात तो साफ हो गई है कि सारा खेल माओवादियों को नख-दंत विहीन किये जान के लिये हो रहा है। गिरिजा प्रसाद कोइराला जब प्रधानमंत्री थे, तब सेना ने दांग के होलारी में माओवादियों के खिलाफ मोर्चा लेने से मना कर दिया था। कोइराला इतन कुपित हुए कि उन्होंने 1जुलाई को इस्तीफा भेज दिया। आज यही कोइराला सेना के सबसे बड़े सरपरस्त हैं। यों भी नेपाल में सत्ता बंदूक की नली से ही निकलती रही है। चाहे वह सत्ता शाह की रही हो, राणाओं की रही हो, या फिर पंचायती व्यवस्था के पैरोकारों की रही हो। राणा शासकों ने 104 वर्षो तक इस देश पर राज किया था। सेना के बूते ही ज्ञानेंद्र और उनके पूर्वज राज भोगते रहे। 1में नेपाली कांग्रेस की मुक्ित सेना के दम पर राणाशाही का खात्मा हुआ था। इसके बाद मुक्ित सेना विघटित कर दी गई थी। लकिन 10 में जब राजा महेंद्र ने बी़ पी़ कोइराला की निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट दिया, तब उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ। माओवादियों ने जन मुक्ित सेना के मामले में शायद इस घटना से सबक लिया है। तभी सेना में समायोजन के सवाल पर नेपाल माओवादी विचार स्कूल इस बहस में उलझा है कि पीएलए लड़ाकों को सेना ही क्यों, उन्हें पुलिस और सुरक्षा के दूसरे महकमों में क्यों ना भेजा जाए? उन्हीं के दूसरे ‘स्कूल’ का दृष्टिकोण यह है कि यदि माओवादी नेपाल की सत्ता पर अपना दबदबा चाहते हैं तो जन मुक्ित सेना का अस्तित्व बनाये रखना ज॥रूरी होगा। ऐसे विचार का दुष्प्रभाव दूसरी पार्टियों पर भी पड़ा है। नेपाल में जो पार्टियां लोकतंत्र का नारा लगा रही हैं, उनके पास भी निजी सेना है। मधेसी जनाधिकार फोरम मधेस के अध्यक्ष भाग्यनाथ प्रसाद गुप्ता कहते हैं-‘राजनीतिक विद्वेष के सबसे बुरे दौर से हम गुज़र रहे हैं। नागरिक समाज का सत्ता में भागीदारी से ही नेपाल में शांति संभव है। हमें संदेह है कि संविधान लिखन का कार्य संभव हो पायेगा।’ वैसे भी नेपाल में जिस तरह से बात-बात पर लोचा खड़ा हो रहा है, उससे लगता नहीं कि संविधान लेखन समय पर हो पाएगा। लोगों ने यह बात लगभग मान ली है कि सेना द्वारा तख्ता पलट की तैयारी वाली ख़बर हक़ीक़त नहीं, फसाना थी। सवाल यह भी है कि नेपाल में सेना मज़बूत हो, और कटवाल अपनी कुर्सी पर बने रहें, इसमें भारत की क्या दिलचस्पी हो सकती है? भारत के किसी भी पड़ोसी देश की सरकार का रिमोट कंट्रोल सेना के पास हो तो यह क्षेत्रीय सिरदर्दी का सबब तो बनेगा ही। यदि सेना के माई-बाप माओवादी हो जाते हैं, तो भी सहज स्थिति नहीं होगी। माओवादियों ने इस बात पर हल्ला बोल रखा है कि नेपाल के आंतरिक मामले में भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के कुछ देश दखल दे रहे हैं। नेपाली मीडिया में यह मज़े लेने का विषय है कि यदि किसी सप्ताह भारतीय राजदूत राकेश सूद प्रधानमंत्री प्रचंड से नहीं मिलते हैं, तो यह ख़बर है। लेकिन सूद दिल्ली से लौटन के बाद रविवार को प्रचंड से चार बार मिले, इसकी भी सुखिऱ्यां बनीं। इसके ठीक उलट चीनी राजदूत छिउ क्वोहोंग माओवादियों से ‘मौन कूटनीति’ खेल रहे हैं। 2 मई को प्रचंड शांति व मैत्री और प्रत्यर्पण संधि के लिए चीन जाने वाले थे। यह यात्रा टल गई। प्रत्यक्ष रुप से इसका कारण सेना से चल रहा विवाद बताया गया, लकिन परोक्ष कारण संधि की पुष्टि के लिए संसद में दो तिहाई मतों का नहीं होना भी है। फिर भी प्रत्यर्पण संधि से सीधा नुकसान तिब्बत के लिए संघर्ष करने वालों को ही होने वाला है। कोइराला इस समय राजनीति के केंद्र में हैं। एमाले नेताओं के सुझाव पर प्रचंड फौज-फाट के साथ मंगलवार को उनसे दूसरी बार मिलने गये। पर बात बनी नहीं। एमाल की शर्त है कि कटवाल ही नहीं, माओवादी प्रतिरक्षा मंत्री राम बहादुर थापा ‘बादल’ भी हटाये जाएं और दूसरे नंबर के कुल बहादुर खड॥का के बदले तीसरे नंबर के छत्रमान सिंह गुरुंग को सेना प्रमुख बनाया जाए। फिर भी यह प्रस्ताव न तो नेपाली कांग्रेस को मान्य है, न ही उसका साथ देने वाली 15 पार्टियों को। माओवादी सांसद सलिकराम ने संसद में ही ललकार लगाई कि सेना से बाद में, पहले नेपाली कांग्रेस से निपटते हैं। नेताओं के निजी अभिमान और सेना प्रमुख के स्वार्थ की लड़ाई में नेपाल धधक रहा है। ऐसे में भारत बिन बुलाये मेहमान की तरह पंचायत न करे, तो अच्छा है! लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नई दिल्ली स्थित संपादक हैं श्चह्वह्यद्धश्चr१ ञ्चrद्गस्र्न्थ्थ्द्वड्डन्द्य.ष्oद्वं

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