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राष्ट्रपति के जरिए राय मांगने को मंत्रिमंडल की मंजूरी

राष्ट्रपति के जरिए राय मांगने को मंत्रिमंडल की मंजूरी

सरकार ने 2जी दूरसंचार लाइसेंस मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले पर इस शीर्ष न्यायालय से राष्ट्रपति के जरिये राय मांगने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इससे जुड़े प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई।

राष्ट्रपति के जरिये मांगी जाने वाली राय में उच्चतम न्यायालय से पूछा जाएगा कि 2जी दूरसंचार लाइसेंस मामले में दिया गया उसका फैसला कि सभी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी की जानी चाहिए.. क्या हर परिस्थिति में अनिवार्य होगा।    

केन्द्रीय मंत्रिमंडल की हुई बैठक में दूरसंचार मंत्रालय के उन प्रस्तावों को मंजूर कर लिया गया जिसमें मंत्रालय ने 2जी मामले में 122 लाइसेंस निरस्त करने के उच्चतम न्यायालय के दो फरवरी के फैसले पर विभिन्न मुद्दों पर राय मांगे जाने का प्रस्ताव किया था।

न्यायालय ने यह भी कहा था कि दूरसंचार स्पेक्ट्रम जैसे प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के लिए नीलामी करना सबसे बेहतर तरीका है क्योंकि पहले आओ पहले पाओ की नीति दोषपूर्ण थी।

बैठक के बाद दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने संवाददाताओं से कहा कि मंगलवार को मंत्रिमंडल ने उन सभी सवालों को साफ कर दिया है जिनके लिए हम राष्ट्रपति के जरिये उच्चतम न्यायालय से राय मांगे जाने पर जोर दे रहे थे।

दूरसंचार विभाग का मानना है कि न्यायालय के फैसले का कई अन्य क्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में जिन क्षेत्रों में पहले आओ पहले पाओ की नीति अपनाई गई है वहां भी उच्चतम न्यायालय का फैसला प्रभाव डाल सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र सरकार की उस समीक्षा याचिका को स्वीकार कर लिया है जिसमें केन्द्र ने लाइसेंस निरस्त होने के बाद अपनाई जाने वाली नीलामी प्रक्रिया के बारे में स्पष्टीकरण मांगा है। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने इसके साथ ही दायर 10 अन्य समीक्षा याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

राष्ट्रपति के जरिये शीर्ष अदालत से जो राय मांगी गई है उसमें यह सवाल उठाया गया है कि उसके 2 फरवरी को फैसले को देखते हुये वर्ष 1994, 2001, 2003 और 2007 में पहले आओ पहले पाओ आधार पर जो दूरसंचार लाइसेंस जारी किए गए क्या उन सभी को अवैध समझा जाए।
 
उच्चतम न्यायालय से इस मुद्दे पर उसकी राय पूछी गई है कि यदि वह इस तर्क से सहमत है तो इस तरह से दिए गए लाइसेंस का क्या किया जाए। यदि न्यायालय का जवाब नहीं में है तो क्या भारत सरकार को पिछले लाइसेंस की शर्तों में संशोधन करना चाहिए ताकि सभी तरह के लाइसेंस में समान शर्तों को रखा जा सके।

कुल मिलाकर सरकार यह जानना चाहती है कि क्या सरकार को मौजूदा लाइसेंसधारकों को दिया गया स्पेक्ट्रम वापस लेना होगा अथवा उनसे पिछली तिथि से आवंटित स्पेक्ट्रम के लिए शुल्क लेना होगा। यदि ऐसा है तो इसका मूल्य क्या होगा और उसकी तिथि क्या होगी।

राष्ट्रपति के जरिये मांगी गई राय में यह और अहम मुद्दा उठाया गया है कि फरवरी का उच्चतम न्यायालय का फैसला क्या सभी क्षेत्रों में सभी परिस्थितियों में प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में अनिवार्य होगा। यह भी पूछा गया है कि सभी परिस्थितियों में स्पेक्ट्रम आवंटन में यह लागू होगा अथवा विशिष्ट परिस्थिति में मौजूदा मामले में यह स्पेक्ट्रम आवंटन में लागू माना जाएगा।
 
राष्ट्रपति के जरिये यह भी राय मांगी गई है कि यदि किसी निवेशक ने सरकारी नीति के तहत कंपनी में निवेश किया है और उस नीति को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया तो उस निवेश का क्या होना चाहिए।

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