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दूरदर्शन से प्रचार न हो

ाब हो कातिल ही मुंसिफ बवाना की छात्रा की मौत की जिम्मेदार टीचर को एक हफ्ते तक भी गिरफ्तार न करके पुलिस ने उसे फरार होने का मौका दिया है। जो उसके भेदभाव, आलस और निकम्मेपन को दर्शाता है। दूसरी ओर निगम ने स्कूल स्टाफ के बयान ले लिए हैं। बयान भी किसके पक्ष जाएंगे पहले से तय है। अगर यह लड़की किसी पुलिस अफसर की मर गई होती तो पुलिस टीचर के रिश्तेदारों तक को गिरफ्तार कर लेती। ऐसा ही हाल में भजनपुरा की पुलिस ने किया है। एक लड़के के कातिलों को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे लोगों को हाथों-हाथ गिरफ्तार कर लिया पर कातिल खुले घूम रहे हैं। छात्रा सन्नोको न्याय नहीं मिलेगा क्योंकि टीचर, पुलिस, सरकारी डॉक्टर, जज सब सरकारी हैं। रशीद सैदपुरी, नसीरपुर, नई दिल्ली चीन का ढकोसला चीन-तिब्बत पर एक विशेष परिश्ष्टि छपा है। जिसमें पुराने तिब्बत की तस्वीर व नवीन तिब्बत की तस्वीर दिखाई गई है। तिब्बत आज तस्वीरों में खुशनुमा, खुशहाल, उमंग पा उन्नति से भरपूर दिखाई दे रहा है। अर्थात चीन ने वहां बहुत तरक्की फैलाई है। पर क्या अत्याचार, बेरोगारी लोगों की बेबसी को दिखाया गया है? शायद नहीं। यह तो वही स्थिति है, जब भारत गुलाम था तो अंग्रेज अपनी तरक्की, खुशहाली को दर्शाते थे, भारतीय बेबसी, उन पर ढाए जुल्म को नहीं। गुलामी गुलामी होती है आजादी आजादी। चाहे वह कितनी भी बेबसी से मिले। सुरन्द्र कुमार पाल, दिल्ली सब गोलमाल है घंटों लाइन में लगना और अन्य यातनाएं भी उठाकर एक मतदाता के वोट देने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। उदाहरणार्थ हमने एक पार्टी क्या सभी को अपनी विचारधारा से अलग पाया और हमने एक पार्टी अन्य को अपना मत दिया। जीतने के बाद जिस पार्टी से विशेष नाराजगी थी, उसी को उसने अपना समर्थन देकर सरकार बनवा दी। एक और बात कोई भी उम्मीदवार मतदाता को कुछ देता है तो चुनाव संहिता का उल्लंघन होता है, जब जीत-हार होने के पश्चात उन्हीं नुमाइंदों की खरीद-फरोख्त होती है तो कुछ नहीं सबूत नहीं मिलते या फिर मिलीभगत होती है इसका मतलब यही हुआ छोटा, गरीब का कोई नहीं पैसे वाले की ही जय-ाय है अशोक गुप्ता, सदर बाजार, दिल्ली कुर्सी का लोकतंत्र कैसा यह वोटतंत्र किड्ढr शैतान हुआ आदमी।ड्ढr कुर्सी के लोकतंत्र काड्ढr गुलाम हुआ आदमी।। डॉ. नंदलाल मेहता वागीश, गुड़गांव

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