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आजाद भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि

नब्बे के दशक के अंत में मुझे बर्कले में प्रतिभाशाली इंडोनेशियाई कार्यकर्ता जॉर्ज आदित्य जोंद्रो के साथ एक कार्यक्रम में शिरकत का मौका मिला था। उस वक्त जोंद्रो की हैसियत देश निकाला पाए शरणार्थी की थी। उन्होंने ऐसे सामाजिक आंदोलनों में हिस्सा लिया था, जिससे वहां के फौजी शासन को दिक्कत हो रही थी। एक आंदोलन किसी बड़े बांध के खिलाफ था, जिसमें फौजी जनरलों और ठेकेदारों को करोड़ों डॉलर मिलने थे। आदित्य जोंद्रो ने एक नारा गढ़ा था, ‘मेगावाट नो, मेगावती यस।’ मेगावती सुकार्णोपुत्री उस वक्त लोकतांत्रिक विरोध की सबसे बड़ी नेता थीं। उस दिन बर्कले में आदित्य जोंद्रो और मैंने एशिया में पर्यावरण की राजनीति पर अपने विचार व्यक्त किए। मैंने अपने भाषण में भारतीय राजनेताओं की काफी तीखी आलोचना की थी। आदित्य जोंद्रो ने सहमति जताई, लेकिन यह भी जोड़ा कि भारत में कम से कम निष्पक्ष आम चुनाव तो होते हैं, इंडोनेशिया में जनरलों के इलेक्शन होते हैं, जो पूरी तरह से गड़बड़ होते हैं।

मुझे इसकी याद कुछ महीने पहले आई, जब मुझे एक एसएमएस मिला। यह जनरल वी के सिंह की उस याचिका पर था, जिसमें उन्होंने अपनी जन्मतिथि 1950 से 1951 करने की मांग की थी। यह याचिका लगभग उसी वक्त आई, जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी चुपचाप दुबई चले गए थे और वहां फौजी तख्तापलट की अफवाहें जोर पकड़ रही थीं। इस एसएमएस में लिखा था, ‘भारत में सरकार सेनाध्यक्ष की उम्र तय करती है, पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष सरकार की उम्र तय करते हैं।’ नागरिक सरकार द्वारा फौज का नियंत्रण एक ऐसी बात है, जो भारत को बर्मा, वियतनाम, थाइलैंड, इंडोनेशिया और चीन जैसे देशों से अलग करती है। इन देशों में फौजी अधिकारी ही राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। कुछ हद तक ऐसा इसलिए हुआ कि इन देशों के स्वाधीनता संग्राम में सशस्त्र राष्ट्रवादियों का प्रभुत्व रहा, जबकि भारत में आजादी का आंदोलन लगभग अहिंसक तरीकों से ही लड़ा गया।

भारत में फौज हमेशा अपनी सीमा में रहती है। यह तथ्य पाकिस्तान से तुलना करने पर ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। इन दो देशों का एक साझा इतिहास, संस्कृति और कानूनी व्यवस्था है, फिर ऐसा क्यों है कि सेना हमारे यहां सिर्फ अपनी पेशेवर भूमिका निभाती है और वहां राजनीति व अर्थनीति में निर्णायक भूमिका अदा करती है? इसके पीछे छह कारण दिखते हैं, जिनकी वजह से भारत में सैन्य अधिकारी सरकार चलाने या राजनीति से दूर रहते हैं।

पहला, भारत में राजनीतिक पार्टियों की ज्यादा पुरानी और मजबूत परंपरा है। कांग्रेस का गठन 1885 में हुआ था और 1917 तक शहरी मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से तक इसकी पहुंच हो गई थी। 1917 के बाद गांधीजी के नेतृत्व में यह ग्रामीण इलाकों में भी गहरे तक पहुंच गई। कांग्रेस की इस सामाजिक व्यापकता को मुस्लिम लीग के आभिजात्य चरित्र से तुलना करके देखा जा सकता है, जो 1909 में गठित हुई और कई दशकों बाद पाकिस्तान के निर्माण का मुख्य कारक बनी। मुस्लिम लीग का ब्रिटिश भारत के कई राज्यों में अस्तित्व था और हर जगह उसमें बड़े जमींदारों का प्रभुत्व था। इसके अलावा, कांग्रेस के साथ-साथ भारत में हिंदू महासभा, कम्युनिस्ट, अकाली और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम जैसी महत्वपूर्ण पार्टियां भी थीं। मुस्लिम लीग का सांगठनिक उथलापन और अन्य विरोधी पार्टियों की अनुपस्थिति से पाकिस्तान में एक शून्य पैदा हुआ, जिसे सेना ने भरा।

दूसरा, ब्रिटिश भारतीय सेना में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पंजाबी मुसलमानों की बड़े पैमाने पर भर्ती हुई। इससे एक सैनिक परंपरा मजबूत हुई और जब पाकिस्तान बना, तो पंजाब उसका सबसे महत्वपूर्ण सूबा बन गया और उसके फौजी भारतीय सैनिकों के मुकाबले अपने देश की राजनीति में ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए। तीसरा कारण यह है कि पाकिस्तानी प्रभुवर्ग भारत से बहुत ज्यादा आक्रांत है, जबकि भारतीय कुलीन वर्ग की वह स्थिति नहीं है। पाकिस्तान ने हमेशा अपने आपको ‘अभारत या भारत विरोधी’ की तरह पारिभाषित किया। ये परिभाषाएं कश्मीर को हड़पने में नाकामी और बांग्लादेश में हार की वजह से और मजबूत हो गईं। इन विफलताओं ने पाकिस्तानी कुलीन वर्ग को भारत के विरोध में ज्यादा मुखर बना दिया। जाहिर है, इससे सेना का महत्व बढ़ता चला गया।

चौथा, पाकिस्तान दुर्भाग्य से शीतयुद्ध का एक बड़ा मोर्चा बन गया। अमेरिका ने उसे अपने अधीन देश की तरह इस्तेमाल किया। 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में अपनी फौजें घुसा दीं, जिसकी वजह से अमेरिका के और करीब पाकिस्तान आ गया। जैसे-जैसे अमेरिकी हथियार आते रहे, वैसे-वैसे पाकिस्तानी समाज में सेना मजबूत होती गई और राजनीतिक पार्टियां व नेता कमजोर हो गए।

पांचवां कारण यह रहा कि आजाद भारत के राजनीतिक नेतृत्व खासकर जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल ने शुरू में ही सेना को यह साफ बता दिया कि आजाद देश में उसकी भूमिका सिमट जाएगी। जब अंग्रेज भारत पर राज कर रहे थे, तब वायसरॉय के बाद देश का सबसे बड़ा अधिकारी कमांडर-इन-चीफ हुआ करता था। इसीलिए राष्ट्रपति भवन के बाद नई दिल्ली में सबसे भव्य इमारत तीनमूर्ति हाउस हुआ करती थी। आजादी के बाद सेनाध्यक्ष के लिए रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करने का नियम बनाया गया। रक्षा मंत्री प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है और प्रधानमंत्री चुनी हुई संसद के प्रति जवाबदेह है। इस बीच वरिष्ठता के क्रम में भी सेना काफी नीचे आ गई। यहां सेनाध्यक्ष की स्थिति 25वीं होती है। उसके ऊपर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्यपाल, यहां तक कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और योजना आयोग के सदस्य होते हैं।

छठा कारण यह है कि पाकिस्तान में प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी लोगों के लिए आगे बढ़ने का सबसे बड़ा जरिया फौज है। भारत में उदार राजनीतिक व्यवस्था और मजबूत अर्थव्यवस्था है। इसलिए यहां का महत्वाकांक्षी नौजवान वकील, डॉक्टर, सरकारी अधिकारी या उद्योगपति हो सकता है। समय के साथ ये पेशे फौजी करियर की अपेक्षा इतने ज्यादा आकर्षक हो गए हैं कि सेना में अब अधिकारियों की कमी हो रही है। इसके विपरीत पाकिस्तान में फौज के पास न सिर्फ आधुनिक और सर्वश्रेष्ठ हवाई जहाज, हथियार और युद्धपोत हैं, बल्कि जमीनें, दफ्तर, होटल और बाजार भी उसकी मिल्कियत में शामिल हैं।

तमाम और कारण हैं। मसलन, भारत में सत्ता हासिल करने के लिए सेना को एक साथ 28 चुनी हुई राज्य सरकारों को भी हटाना होगा। जो भी हो, सेना की अराजनीतिक भूमिका और नागरिक सरकार की सेना पर पकड़ भारतीय लोकतंत्र की महान उपलब्धि है। आजादी के बाद भारतीय सेना ने एक भी बार राजनीतिक क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं किया। जनरल वी के सिंह, ए के एंटोनी और भ्रष्टाचार की सच्ची-झूठी कहानियां जो भी हों, लेकिन सेना और सरकार का संबंध एक ऐसी उपलब्धि है, जिस पर हम सब वाकई गर्व कर सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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