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नेपाल में भारत विरोधी बवाल

पूरी दुनिया लुंबिनी को बुद्ध के जन्म स्थान के कारण जानती है। लुंबिनी नेपाल में है, और भारतीय सीमा वाले शहर सुनौली से 27 किलोमीटर दूर है। बुद्ध के जन्म स्थल को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। वजह वहां पर मिला अशोक स्तंभ है। 403 ईस्वी के आसपास चीनी यात्री फाहियान ने सबसे पहले इस स्थल की पहचान की थी। लुंबिनी को नए सिर से पूरी दुनिया में पहचान दिलाने के लिए 18में एक जर्मन पुरातत्वविद फ्यूहरर ने वहां अशोक स्तंभ की खोज की थी। अशोक स्तंभ पर ब्राह्मी लिपी में उकेरा हुआ है- ‘देवों के प्रिय राजा प्रियदर्शी ने स्वयं यहां शाही यात्रा की। भगवान बुद्ध ‘शाक्यमुनि’ ने यहां जन्म लिया, इसलिए लुंबिनी गांव के लोग कर का आठवां भाग ही दिया करंगे।’ सम्राट अशोक ने लुंबिनी के इस स्तंभ पर शांति, अहिंसा का संदेश नहीं देकर, राजकीय आदेश क्यों दिया? साधारण सी बात है कि तब यह पूरा इलाका मौर्य साम्राज्य के अधीन हुआ करता था। शांति संदेश के बदले शासनादेश, मौर्य कूटनीति का हिस्सा ही कहा जा सकता है। 1में अशोक स्तंभ समेत लुंबिनी के बौद्ध जन्म स्थल को यूनेस्को ने विश्व विरासत के रूप में मान्यता दे दी। अशोक स्तंभ पर उकेर शब्दों को लेकर नेपाल की सत्ता संभालने वाली किसी भी सरकार को आपत्ति नहीं हुई। नेपाल पर मौर्य ही नहीं, लिच्छवी राजाओं ने भी 87ईस्वी तक राज किया था। 11वीं सदी में दक्षिण भारत से चालुक्य शासकों तक ने नेपाल का सिंहासन संभाला था। ठकुरी, मगर, मल्ल, किरात-लिंबू देसी शासक थे। इसका मतलब यह नहीं कि भारत यह दावा कर दे कि मौर्य काल से लेकर चालुक्य तक, नेपाल की जिस जमीन पर भारतीय सत्ता की मुनादी होती थी उसे नई दिल्ली को वापिस होनी चाहिए। आज की तारीख में उस इतिहास को बघारने की जरूरत उन लोगों के लिए पड़ी है, जो यह दावा करते आ रहे हैं कि भारत ने 53 स्थानों पर नेपाल का 58वर्ग किलोमीटर भूमि अतिक्रमण किया है। इस आग में और घी डालने के लिए वरिष्ठ माओवादी नेता मोहन वैद्य ‘किरण’ सुगौली संधि खारिा करने की मांग कर चुके हैं। उनका तर्क है कि इससे नेपाल पर भारत का वर्चस्व नहीं रहेगा। मोहन वैद्य ‘किरण’ ने प्रधानमंत्री प्रचंड की दूसरी बार भारत यात्रा से 72 घंटे पहले इस तरह की मांग कर जता देना चाहते हैं कि पार्टी में हार्ड लाइनर्स के पंजे अभी कमजोर नहीं पड़े हैं। 2 दिसम्बर 1815 को ब्रिटिश, भारत और नेपाल के बीच हुई सुगौली संधि के बिना पर गोरखा सैनिकों की बहाली की शुरुआत हुई। हार्डलाइनर मानते हैं कि इस संधि के कारण सिक्िकम नेपाल के हाथ से निकल गया। कुमाऊं, गढ़वाल और कांगड़ा के नेपाली भूभाग को अंग्रेजों ने उससे हथिया लिए। कुछ जमीनें 1816 में संधि पुनरीक्षण के बाद मिलीं। सिपाही विद्रोह कुचलने में गोरखा सैनिकों की मदद से खुश होकर अंग्रेजों ने 1865 में कुछ जमीनें नेपाल को वापिस कीं। कठोरपंथी इसे साहब बहादुर की बख्शीश मानते हैं, जो नेपाल की गरिमा को ठेस पहुंचाती है। अद्भुत संयोग है कि जो बात माओवादी हार्डलाइनर को पसंद है, वही बात सत्ता में भागीदार एमाले नेताओं और तराई के कुछ अलगाववादी गुटों को भी रास आ रही है। महाकाली संधि रद्द कराने की जिद एमाले ने छोड़ी नहीं है, इसके पीछे पश्चिम नेपाल का भारत विरोधी वोट बैंक है। नेपाल पुनर्निर्माण के एजेंडे से हटकर नए-नए विवाद क्यों पैदा किए जा रहे हैं? इस प्रश्न पर मधेसी पीपुल्स राइट फोरम के नेता भाग्यनाथ प्रसाद गुप्ता कहते हैं, ‘यह सब देशवासियों का ध्यान बंटाने के लिए माओवादियों द्वारा छोड़ा शोशा है। वे तराई का विकास नहीं चाहते हैं, तराई को बांटना चाहते हैं। देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेलने की साजिश हो रही है।’ भाग्यनाथ गुप्ता पूछते हैं, ‘सेना में सिर्फ माओवादी ही क्यों, तराई के लड़ाके क्यों नहीं भर्ती हों?’ यों भी सेना में माओवादी लड़ाकों के समायोजन का मामला लटकता नजर आ रहा है। सरकार में सहयोगी मधेसी जनाधिकारी फोरम ने इससे अपने हाथ खींच लिए हैं। माओवादी नेतृत्व के लिए न तो यह उगलते बन रहा है, न निगलते। माओवादी लड़ाकों का खून अब अपने नेताओं के खिलाफ खौल रहा है। ऐसे कई मौके आए जब वे कैंपों से भागे। फिर उन्हें मना कर लाया गया। डर यही है कि कहीं वे अपने नेताओं के लिए ‘भस्मासुर’ नहीं साबित हों। वैसे यह समझ में नहीं आता कि बंदूक के बदले, बंदूक पकड़ाने का फामरूला किस दिमाग की उपज है। क्या माओवादी बंदूकधारियों को सिविलियन नौकरी नहीं दी जा सकती? नेपाली सेना वैसे भी आंख मूंद कर जहर पीने के मूड में नहीं दिखती। वहां अंदर ही अंदर एक ज्वालामुखी तैयार हो रहा है। रहा सवाल विपक्षी नेपाली कांग्रेस का, तो वे कहीं से नहीं चाहेंगे कि सेना में माओवादियों का समायोजन हो। क्योंकि तब सत्ता वाकई बंदूक से निकलेगी। नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता देवेन्द्र लाल नेपाली कहते हैं, ‘राजतंत्र की तरह माओवादी सेना को मुट्ठी में रखना चाहते हैं ताकि देश को फिर गुलाम बना सकें। यह सबसे बड़ी गलती होगी और इसका सीधा खामियाजा भारत को भुगतना होगा।’ जिस संविधान सभा चुनाव के हुए आठ माह गुजर गए, उसकी इबारत लिखने की शुरुआत अब तक नहीं हुई। नारायण मान विजुक्छे के नेतृत्व में बनी संसदीय समिति ने तय किया कि अप्रैल 2010 तक नया संविधान तैयार कर लिया जाएगा। यानी चुनाव से चंद दिन पहले। माओवादी सरकार के लिए यह टाइमपास नहीं तो क्या है? विश्व के वृहतम संविधानों में से एक, भारतीय संविधान है। इसे तैयार करने में सिर्फ दो माह, छह दिन लगे थे। 2अगस्त 1ो डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में छह सदस्यी ड्राफ्ट कमेटी बनी, और 4 नवम्बर 1ो संविधान तैयार कर संसद में पेश कर दिया गया था। उस जमाने में कंप्यूटर भी नहीं था। अब नेपाली संविधान निर्माताओं की नीयत में खोट खोजे जाने लगे हैं। इसी कारण नेपाली कांग्रेस ने ‘सीए’ पर समर्थन के लिए नौ शर्ते रख दी हैं। सोचने की बात है कि जिस देश का संविधान लिखने में सोलह माह लगेंगे, उस देश को विकास की पटरी पर लाने में कितने साल लगेंगे? यह बात ‘बिम्सटेक’ शिखर बैठक में आए प्रधानमंत्री प्रचंड से पूछनी चाहिए। और सवाल नेपाल की जनता से भी पूछना चाहिए कि आप सब कब तक ‘पप्पू’ बने रहेंगे? लेखक ईयू-एशिया न्यूज के नई दिल्ली स्थित संपादक हैं।ं

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