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संत रवि साहब

गुजरात की निगरुण संत परंपरा में संत रवि साहब का नाम सबसे ऊपर आता है। संत रवि साहब एक अनुभवी और ज्ञानी संत थे। उन्होंने अपनी वाणी में यौगिक साधना और तपस्या तथा अद्वैत ब्रह्म निगुर्ण निर्विकार राम नाम चिंतन का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया। संत रवि साहब का गुजराती साहित्य को परमात्मा के सत्य-रूप चिंतन से समृद्ध बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका जन्म गुजरात के आमोद तालुका के तणछा ग्राम में सन् 1में हुआ था। रवि साहब की बचपन से ही अध्यात्म में रुचि थी। साधु-संतों की सेवा और सत्संग में उनका मन बहुत लगता था। और वह जसे-ौसे बड़े हुए उनके मन में वैराग्य उत्पन्न होने लगा। वह सद्गुरु की खोज में चल पड़े। उस समय पूर गुजरात में सनत भाण साहब का बहुत प्रभाव था। उन्हें संत कबीर और दत्तात्रेय का अवतार माना जाता था। रवि साहब इन्हीं भाण साहब की शरण में आ गए। भाण साहब ने गुरुमंत्र देकर बताया कि परमात्मा का नाम ही सच्चा है। किसी और का सहारा न लेकर केवल परमात्मा का भजन करने से ही परम गति की प्राप्ति होती है। भगवान का नामस्मरण करने में उनका अटूट विश्वास था। वह कहते थे कि अन्य सभी साधनों को छोड़कर रामनाम का ही उच्चारण करना चाहिए। संतों ने सदा रामनाम की ही शरण ली है। नाम-साधना ही संत रवि साहब के भगतचिंतन का स्वरूप थी। वह कहते थे- ‘राम नाम ही सार तत्व है, सबका मूल है। राम अखिल रूप आनंद है। बिना राम नाम के, यह जगत एक महाजाल है, फन्दा है।’ रग-रग राम रमि रह्यौ, निरगुन अगुन के रूप।ड्ढr राम श्याम रवि एक ही, सुंदर सगुन सरूप।। संत रवि साहब की वाणी में सगुण और निगरुण- दोनों रूपों का बड़ा सहा समन्वय मिलता है। रवि साहब ने कहा- ‘जीभ से रामनाम का उच्चारण, कान से रामनाम का श्रवण, नयन से राम का दर्शन ही सच्ची साधना है।’

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