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तमिलनाडु: हिंद महासागर से गहरा है तमिल संकट

श्रीलंका के तमिलों का मामला भारतीय राजनीति के केन्द्र में फिर से आ गया है। इस मसले ने एकबारगी संप्रग सरकार के वजूद को खतर में डाल दिया था। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने मंत्रियों सहित सभी पार्टियों के सांसदों के इस्तीफे एकत्र कर लिए थे और दिवाली के बाद सम्बद्ध संवैधानिक अधिकारियों को भेज देने की घोषणा की थी। उन्होंने ये इस्तीफे 14 अक्तूबर को सर्वदलीय सम्मेलन में पास प्रस्ताव के आधार पर हासिल किए थे। राज्य के प्रमुख विरोधी दल अद्रमुक और उसके सहयोगी दलों ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया था। बहरहाल इस्तीफा देने का मामला टल गया और केन्द्र सरकार के सामने खड़ा संकट भी दूर हो गया। हालांकि श्रीलंका के तमिलों का मसला हिन्द महासागर के आसपास बसे सभी तमिलों के लिए हमेशा से संवेदनशील विषय रहा है, पर यह पहला मौका था, जब महत्वपूर्ण राजनैतिक दल मिलकर सड़कों पर उतर आए। सत्ताधारी द्रमुक संप्रग सरकार पर दबाव डाल रहा है कि वह तमिलों का ‘संहार’ रोकने के लिए श्रीलंका सरकार पर दबाव बनाए। करुणानिधि ने जनता का आह्वान किया है कि इस उपमहाद्वीप में तमिलों की रक्षा के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लाखों टेलिग्राम भेजें। इस अपील का द्रमुक और दूसर दलों के कार्यकर्ताओं पर इतना असर पड़ा कि प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों और कस्बों के डाकखानों पर जनसमूह उमड़ पड़े। उधर इस तरह की खबरं मिल रही थीं कि श्रीलंका की सेना ने लिबरशन टाइगर्स और तमिल ईलम (लिट्टे) के प्रशासनिक मुख्यालय किलिनोच्ची को घेर लिया है। प्रधानमंत्री को लाखों टेलिग्राम भेजने और सभी सांसदों के इस्तीफे जमा करने की कार्रवाई, पूर्व मुख्यमंत्री और अद्रमुक महासचिव जे. जयललिता के कोंचने की वजह से हुई थी। जयललिता ने श्रीलंका में तमिलों की हत्याओं के संदर्भ में मुख्यमंत्री पर तीखे व्यंग्य बाण छोड़े थे। अद्रमुक कैम्प के एक दल एमडीएमके ने टेलिग्राम ड्रामा को जनता का ध्यान खींचने की कार्रवाई भर बताया। दूसरी पार्टियाँ भी इस तानाकशी में शामिल हो गईं। सीपीआई ने कहा, श्रीलंका की फौाी कार्रवाई में निर्दोष तमिलों की हत्या के मद्देनजर तमिलनाडु की सभी पार्टियों को यूपीए सरकार से बाहर आ जाना चाहिए। तमिल मसले पर बयानबाजी के मामले में सीपीआई किसी से पीछे नहीं रही। गांधी जयंती के रो इसके प्रदेशव्यापी उपवास के बाद यह मसला केन्द्रीय मसला बन गया और सभी पार्टियों को अपना विरोध दर्ज कराने को मजबूर होना पड़ा। उसके पहले तक श्रीलंका के तमिलों का मामला सेमिनारों और कार्यशालाओं तक सीमित था। राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य विरोधी पार्टी भाजपा भी इस आंदोलन में कूद पड़ी। उसने कहा यदि यूपीए सरकार पर इस स्थिति में निर्णायक भूमिका निभाने का दबाव नहीं बनाया जा सकता, तो द्रमुक को सरकार से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नपा-तुला वक्तव्य जारी किया, जिसमें बढ़ती हिंसा पर चिंता व्यक्त की गई और कोलम्बो सरकार से आग्रह किया गया कि वह सैनिक विजय हासिल करने के बजाय बातचीत के जरिए राजनैतिक समाधान निकाले। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसा समझौता होना चाहिए, जिसमें श्रीलंका की एकता और अखंडता कायम रहे साथ ही अल्पसंख्यकों, खासकर तमिलों के, मानवाधिकार सुरक्षित रहें। तमिलनाडु के अन्य राजनैतिक मसलों की तरह, श्रीलंकाई तमिलों के मामले का एक फिल्मी कोण भी है। एक दिलचस्प बात यह है कि राज्य का फिल्म उद्योग तमिल फिल्मों के ओवरसीज राइट्स के मार्फत काफी रकम प्राप्त करता है। इस मसले पर भी राजनीति हावी है। फिल्म उद्योग दो खेमों में बंट गया है। एक डायरक्टरों का और दूसरा एक्टरों का। लोकप्रिय डायरक्टर भारतीराजा ने रामेश्वरम में रैली निकालने की घोषणा की। तकरीबन सारे कलाकार, कोई न कोई बहाना बनाकर, उससे अलग रहे। सभी सितारों ने अलबत्ता एक्टर-राजनेता सरत कुमार के प्रस्तावित एक दिन के उपवास में शामिल होने पर सहमति व्यक्त कर दी। राजा द्रमुक के करीबी माने जाते हैं। उन्होंने सरत कुमार पर आरोप लगाया कि वे अपने राजनैतिक करियर को बनाने के लिए श्रीलंकाई तमिलों की तकलीफों पर रोटियाँ सेक रहे हैं। सरत कुमार विपक्षी खेमे में हैं। वे ऑल इंडिया समतुवा मक्काल काच्ची के प्रमुख हैं। राजा के साथ उनकी अदावत पिछले कुछ महीनों से चल रही है। इसकी शुरुआत तब हुई थी, जब बेंगलूर में तमिल फिल्म सम्पत्ति के ध्वंस के विरोध में उन्होंने प्रदर्शन आयोजित किया और राजा उसमें नहीं आए। बहरहाल आने वाला समय मनमोहन सिंह की परीक्षा का समय है। उन्हें मध्यमार्गी तमिलों के समर्थन की नीति को प्रभावी बनाना होगा। मध्यमार्गी तमिल आकांक्षा है श्रीलंका की राजव्यवस्था के भीतर तमिल होमलैंड की स्थापना। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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