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विदेशी भी ‘रैट फ्रेंडली कांसेप्ट’ के दीवाने

बिहार के ‘रैट फ्रेंडली कांसेप्ट‘ के दीवाने हो गये विदेशी भी। श्रमशक्ित के लिए देश में विख्यात बिहारियों के दिमाग की भी दाद देती हैं विदेशी संस्थाएं। तभी तो महादलितों के कल्याण के लिए समाज कल्याण विभाग के चूहा पालने के विचार ने पूर विश्व में तहलका मचा दिया। बताने वाले इसे ‘उल्टी खोपड़ी की सोच’ बताते रहें, लेकिन सच्चाई यह है कि बिहारी अधिकारी के दिमाग में उपजी इस सोच ने तो न सिर्फ विश्व का दिल जीत लिया बल्कि विहारियों की प्रतिष्ठा में भी चार चांद लगा दिया। विभाग के प्रधान सचिव विजय प्रकाश की इस सोच को विश्व खाद्य समस्याओं पर अध्ययन के लिए प्रसिद्ध वाशिंगटन की हडसन इन्स्टीच्यूट ने सवरेत्तम गैर वैज्ञानिक सोच बताया है।ड्ढr ड्ढr अमेरिका की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका अमेरिकन क्रोनिकल ने इसे अगस्त 2008 के विश्व की पांच महत्वपूर्ण सीखों में शामिल किया है। बीबीसी और वॉयस ऑफ अमेरिका ने तो बिहार के इस नवीन प्रयोग को गंभीरता से लेते हुए अंन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विचार के योग्य बताते हुए चूहे के मांस के निर्यात की संभावना जताई है। सरकार का मानना है कि समुदाय की पहचान और प्रतिष्ठा में तभी वृद्धि होती है जब उस समुदाय से जुड़े पेशे का व्यवसायीकरण होता है। चूहा मांस के व्यवसायीकरण से चूहा पालने वाले समाज का उद्धार संभव है। साथ ही चूहों द्वारा बर्बाद किया जाने वाला विश्व खाद्य का बड़ा हिस्सा बच जायेगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लें तो पौष्टिकता के मानदण्ड पर भी यह खरा उतरता है। मेडिकल साइन्स के अनुसार चूहे के मांस में प्रोटिन की मात्रा 23.6 होती है जबकि बकरे और चिकेन के मांस में इसकी मात्रा क्रमश: 21.4 और 25.होती है। ऊरा (कैलोरी) की मात्रा भी इसमें कम होती है तो कैल्सियम सर्वाधिक पाया जाता है।

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