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विकास की बयार

आजकल अपना सूबा विकासमय है। जिधर देखिये उधर विकास हो रहा है। विकास नहीं तो उसकी बातें हो रही हैं। यानी कुल मिलाकर वातावरण बुरी तरह विकासाच्छादित है। मुझे भय है कि वाकई विकास हो गया तो क्या होगा। मेरी बात को अन्यथा न लिया जाए। दरअसल, सूबे के लोगों को विकास की आदत नहीं है। वे टूटी सड़कों पर चलने के आदी हैं। खुले मैनहोलों का निमंत्रण ठुकरा नहीं पाते।ड्ढr ड्ढr सरकारी दफ्तर का बाबू अगर पहली बार में ही काम कर दे तो उसे संदेह की नजरों से देखने लगते हैं। ऐसे बेचार लोग शायद विकास का सदमा बर्दाश्त न कर सकें। लेकिन, विकास तो होना ही है। चूंकि सरकार ने ठान लिया है। कुछ- कुछ दिखने भी लगा है। ये बात मैं नहीं कह रहा बल्कि एक अनुभवी नेत्रहीन भिखारी के मुंह से सुनी है। सुना है कि सरकार अब पार्को के जरिये एक और ‘हरित क्रांति’ करने जा रही है। पहले खेतों से हरित क्रांति होती थी। चूंकि अब तमाम गांव वाले पंजाब और हरियाणा में हरित क्रांति करने चले जाते हैं इसलिए सूबे की हरित क्रांति की खुराक पूरी नहीं हो पा रही है।ड्ढr ड्ढr सूबे में इतने सार पार्क बनने जा रहे हैं कि बाद में शायद उन्हें संभालने के लिए अलग व्यवस्था ही बनानी पड़ जाए। व्यवस्था बनेगी तो नियुक्तियां भी होंगी। हेड माली, डिप्टी माली, असिस्टेंट माली। जब इतने सार पद होंगे तो हड़ताल कराने को संगठन भी चाहिए। लिहाजा माली एसोसिएशन का गठन करना पड़ सकता है। पार्को का सुख शहरों के पास बसे गांव वाले भी उठा सकते हैं। वे खेतों के बजाय लोटा लेकर निकटवर्ती पार्क को कृतार्थ कर सकते हैं। ये उनके लिए बोनस होगा तो पार्क के पेड़- पौधों के लिए फोकट की खाद मिलती रहेगी। तो मित्रों, विकास की बयार बहुत तेजी से बह रही है। ऊपर वाला इसे नजर-ए-वक्त से बचाए। आप भी कलेजा थामकर सार सपने पूर होने का इंतजार करिये।ं

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