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‘देशद्रोही’ की सकारात्मक भूमिका पर प्रश्न चिन्ह

शुक्रवार के दिन राजधानी के दो सिनेमा घरों में ‘विवादास्पद फिल्म’ देशद्रोही प्रदर्शित हुई। फिल्म विषय, ट्रीटमेंट और संवाद के कारण विवादों में रही। लगभग दो वर्षो से ‘मनसे’ का आक्रोश उत्तर भारतीय झेलते आ रहे हैं। ऐसे में ‘देशद्रोही’ जैसी फिल्म उत्तर भारतीयों की मानसिकता से इस समय मेल खाती दिखलायी पड़ रही है। बहुत सोच समझकर कमाल राशिद खान ने इस फिल्म का निर्माण किया है। कभी-कभी चर्चा में रहने और तात्कालिक लाभ प्राप्त करने के लिए भी ऐसी फिल्में बनायी जाती हैं जिन्हें प्रायोजित फिल्म की संज्ञा दी जाती है।ड्ढr ड्ढr यह सेंसिटिव मामला है और देश में हिंसा की राजनीति को इससे बढ़ावा मिलेगा। हिंसा का जवाब कभी भी हिंसा नहीं है। अगर ऐसा होता तो गांधी और गौतम के विचार निर्थक हो जाते। फिल्म में निगेटिव भावना की झलक ज्यादा है। गीत-संगीत भी फिल्म के मूड के लायक नहीं हैं तो दर्शकों को मिश्रित भाव से गुजरना पड़ता है। साहित्यकार कलाकार, बुद्धिजीवी और आम आदमियों ने इस फिल्म को देखकर कुछ ऐसी ही भावना व्यक्त की है।ड्ढr दिनेश कुमार जो छात्र हैं उनका विचार है कि फिल्म का संदेश अच्छा है लेकिन आक्रोशपूर्ण संवाद से आहत भी हो सकता है। आपसी सद्भावना को ठेस भी पहुंच सकती है। राज ठाकर के प्रति आक्रोश जरूर है लेकिन वे भी तो भारतवासी हैं उन्हें फिल्म की बातों को समझना चाहिए।ड्ढr ड्ढr आयुष का मानना है कि फिल्म के कुछ दृश्य काफी यथार्थ पूर्ण हैं। शंका यह है कि ऐसे दृश्यों से तोड़फोड़ न हो जाए। वैसे ऐसी फिल्म केयर के साथ बननी चाहिए। आदित्य कहते हैं कि राज ठाकर जैसे व्यक्ितयों के कारवा ही ऐसी फिल्में बनती हैं। कुल मिलाकर मिश्रित भाव को यह फिल्म प्रकट करती है। कुछ लोग इसे निगेटिव भी मान सकते हैं।ं

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