अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आज का झारखंड : लाचार प्रशासन, हताश जनता

एक राजनेता की परिधि से निकल कर एक नागरिक के रूप में जब मैं झारखंड की स्थिति को देखता हूं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि झारखंड के आठ वर्षो का इतिहास एक गोलरहित अनिर्णित फुटबाल मैच की तरह है। जनसरोकार के मैदान पर शासक से लेकर शासित तक हर किसी ने खूब खेला और अपने कला-कौशल का प्रदर्शन किया, पर जनसरोकार के मैदान पर खेले गये इस दीर्घकालीन मैच में जन आकांक्षाओं के गोलपोस्ट में जन कल्याण का गोल नहीं दागा जा सका।ड्ढr भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, राजनीतिक अस्थिरता, नौकरशाही की अस्थिरता तथा नीतियों में निरंतरता का अभाव झारखंड के वर्तमान स्वरूप के कारक तत्व हैं। झारखंड के शुरुआती वर्षो का लाभ भी बाद के वर्षो के दिशाहीन, नीतिविहीन एवं अदूरदर्शी राजनैतिक नेतृत्व की बलि चढ़ गया। अपने आठ सालों के दौर में झारखंड ने चार मुख्यमंत्री एवं छह मुख्य सचिवों को देखा है। इस राजनैतिक अस्थिरता एवं नौकरशाही की अस्थिरता ने नीति की अस्थिरता को जन्म दिया है। फलस्वरूप राज्य में विकास का कोई दीर्घकालीन सोच एवं ढांचा तैयार नहीं हो पाया है। अपनी विपुल खनिज संपदा से भारतीय अर्थव्यवस्था को पोषक तत्व प्रदान करने वाला झारखंड खुद एक कुपोषित राज्य के रूप में अपने अस्तित्व के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। इस गोलरहित अनिर्णित मैच का परिणाम सामने है। राज्य में वर्तमान एवं भूतपूर्व खिलाड़ियों (शासकों) की एक लंबी फौज है। इनकी उपलब्धियां संदेह के घेर में हैं। हमार नौनिहालों का भविष्य संवारने की खातिर तैनात किये गये पारा शिक्षकगण अभी सड़क पर हैं। स्कूलों में ताले लटक रहे हैं। राजधानी के 20 किलोमीटर के दायर में एक गांव में अज्ञात बीमारी से चंद दिनों के अंतराल पर दर्जनों मौत हो रही है। नक्सलियों द्वारा राजधानी की सीमा पर ट्रक फूंके जा रहे हैं। व्यवसायी वर्ग भयाक्रांत है। किसान उपेक्षित हैं। उद्योगपति अपमानित हो रहे हैं। शासक वर्ग आंदोलनकारियों की भाषा बोल रहे हैं। अभी भी 76 प्रतिशत घरों में बिजली नहीं पहुंच पायी है। 60 प्रतिशत लोगों को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं है। 66 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क यातायात की सुविधा नहीं है। प्रतिशत खेती योग्य भूमि के लिए सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं है। राज्य के खाद्यान्न का वर्तमान स्तर जनसंख्या के सिर्फ 48 प्रतिशत हिस्से की ही जरूरतों को पूरा करने में समर्थ है। सूचना क्रांति के इस युग में राज्य के मात्र 20 प्रतिशत घरों में दूरदर्शन उपलब्ध है। झारखंड एक ऐसे लोकतंत्र की दास्तान है, जहां लोक एवं तंत्र का आपसी तारतम्य ही बिगड़ गया है। राज्य के शासक वर्ग को अपने कर्म से ज्यादा अपनी कलाबाजियों पर भरोसा है। फलत: वे लगातार सुलगते जनाक्रोश की उपेक्षा कर रहे हैं। तंत्र से त्रस्त लोक अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।झारखंड की लगभग तीन करोड़ आबादी का 78 फीसदी हिस्सा गांवों में बसता है। कृषि एवं इससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियां झारखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। सरकार के आंकड़े ही बताते हैं कि राज्य गठन के बाद से अब तक की अवधि में शुद्ध राज्य घरलू उत्पाद (एनएसडीपी) में प्राथमिक क्षेत्र यथा कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, खनन, वन उत्पाद आदि के हिस्सेदारी में कमी आयी है। स्पष्टत: राज्य की बड़ी आबादी के जीवन आधार क्षेत्र का संकुचन हुआ है। फलस्वरूप गरीबों की गरीबी बढ़ी है। बेरोजगारी, भुखमरी एवं बीमारी में वृद्धि हुई है।यदि आप राजनीतिक घटनाक्रम को याद करं, तो पायेंगे कि वर्ष 02-03 के बाद से ही राज्य में राजनीतिक अस्थिरता तथा सरकार परिवर्तन का दौर प्रारंभ हुआ है। अत: राजनीतिक अस्थिरता तथा राज्य के विकास पर इसके नकारात्मक प्रभाव को स्पष्टत: समझा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में स्थिर सरकार होने के कारण शुद्ध राज्य घरलू उत्पाद की वृद्धि दर में लगातार बढ़ोतरी हुई है। छत्तीसगढ़ में वृद्धि दर जहां 8.67 प्रतिशत से बढ़कर 15.1प्रतिशत हो गयी, वहीं उत्तराखंड में 12.88 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत हो गयी। यह राज्य के विकास की गति एवं स्वरूप पर राजनैतिक स्थिरता एवं विकास के प्रति राजनैतिक प्रतिबद्धता के अभाव को रखांकित करता है। उल्लेखनीय है इन तीनों राज्यों का जन्म एक ही साथ हुआ है। फिर भी झारखंड विकास के पायदान पर लगातार नीचे फिलता गया, वहीं अन्य दोनों राज्य ऊपर चढ़ते गये। नक्सलवाद की समस्या नहीं होने के कारण उत्तराखंड की विकास दर नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ एवं झारखंड से काफी अधिक रही।राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में भी अस्थिरता का आलम रहा है। अल्पावधि के अंतराल पर पदाधिकारियों के स्थानांतरण के परिणाम अच्छे नहीं रहे हैं। राज्य की नौकरशाही में अस्थिरता तथा प्रशासनिक ढांचा का राजनीतिकरण राज्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। धर्म, वर्ग एवं जाति के आधार पर किसी भी राज्य में जनता, राजनेता एवं प्रशासक की गोलबंदी अंतत: राज्य को विनाश की ओर ही ले जायेगी। उत्तरप्रदेश इसका ज्वलंत उदाहरण है। अत: संकीर्ण विचारधाराओं के कीचड़ में फंसा विकास रथ कतई आगे नहीं बढ़ सकता।्रशासन तंत्र से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने उत्तरदायित्व के प्रति सजग रहें तथा नियमों के दायर में जनकल्याण के कार्यो के प्रति अपने आप को समर्पित करं। राजनैतिक नेतृत्व की भी अपनी सीमाएं होती हैं। राजनैतिक नेतृत्व की सीमाओं, जन कल्याण के कार्यो एवं विधि-सम्मत उत्तरदायित्वों के निर्वहन के बीच नियम-संगत संतुलन कायम करना आज की व्यवस्था में राज्य के प्रशासन तंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। दक्षता आधारित जनोन्मुखी निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था बहाल करने की दिशा में सार्थक पहल का मैं हिमायती हूं। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने भी कहा है कि निष्पक्ष नौकरशाही लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता की एक आवश्यक शर्त है।हाल के वर्षो में झारखंड में बनी सरकारं अपनी ही समस्याओं से ग्रसित रही हैं। ये समस्याएं परिस्थितिजन्य हैं और इसके लिए व्यक्ित विशेष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन इसके परिणामस्वरूप राजनैतिक स्तर पर दीर्घकालीन दृष्टिकोण एवं सोच का अभाव रहा। लगातार सरकार परिवर्तन के कारण नीति के क्षेत्र में भी अस्थिरता रही है। किसी भी मुद्दे पर दीर्घकालीन नीति नहीं अपनायी जा सकी। नीति के स्तर में स्थिरता का अभाव झारखंड का दुर्भाग्य रहा है। इस परिस्थिति में राज्य के बाहर निकलने की कुंजी जनता के हाथ में है और पहल भी उसी स्तर से की जानी है। समाज की विभिन्न जातियों, धर्मो एवं वर्गो को विकास के मुद्दे पर गोलबंद होना होगा। संकीर्ण विचारों के कीचड़ से बाहर निकल कर विकास के मुद्दे पर एकमत होना होगा तथा चरित्र एवं प्रतिभा के आधार पर योग्य शासक के चयन हेतु विवेकपूर्ण निर्णय जनता को लेना होगा। उद्देश्य शासक परिवर्तन नहीं शासन परिवर्तन होना चाहिए। एक ऐसा शासन, एक ऐसा राज्य जो जन आकांक्षाओं के पैमाने पर खरा उतर।समाज में सद्भाव एवं सहयोग की धारा प्रभाहित कर सके तथा भय, भ्रष्टाचार एवं भूख से मुक्त समाज के निर्माण की दिशा में सार्थक पहल कर सके। सामाजिक समरसता, धार्मिक सद्भाव, प्रशासनिक निष्पक्षता एवं राजनीतिक स्थिरता विकास की आवश्यक पूर्व शर्ते हैं।ंं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: आज का झारखंड : लाचार प्रशासन, हताश जनता