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दो टूक

000 में शिशु झारखंड ने पथरीली जमीन पर पहला डग भरा था। नियति से आंखें मिलायीं, तो हौसले बुलंद थे। अपने पैरों पर चलकर वह अपने गांव, इसके लोग, खेत-खलिहान, झाड़-ांगल और अरसे से उपेक्षित माटी का र्का चुकाना चाहता था। सिर पर राजसत्ता का ताज था। सबकुछ तो ठीक था, पर बीते आठ सालों में इसे किस व्याध ने जकड़ लिया? चाल कैसे उलटी हो गयी? रियाया भूखी है, जमीन छिन रही, जंगल नंगे हो रहे हैं। मलाई ऊपर बैठे लोग खा रहे हैं, नीचे तक छांछ भी नहीं पहुंच रही। शिशु झारखंड की आज आठवीं वर्षगांठ है। पर यह सिर्फ इसलिए उदास है, क्योंकि सुशासन की राह नापते इसके पांवों में छाले पड़ गये हैं, मंजिल का कहीं पता ही नहीं। बहरहाल, हैप्पी बर्थडे झारखंड!

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