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राजनैतिक हकीकत के हिसाब से बनाया बजट: प्रणव

राजनैतिक हकीकत के हिसाब से बनाया बजट: प्रणव

बजट में ठोस कदम नहीं उठाये जाने को लेकर हो रही आलोचनाओं के बीच वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने रविवार को कहा कि संसद में राजनीतिक हालात को ध्यान में रखते हुए बजट तैयार करने में अतिरिक्त सावधानी बरती। हालांकि, उन्होंने बढ़ती पेट्रोलियम सब्सिडी की समस्या से निपटने पर जोर दिया।

हर साल की तरह इस बार भी बजट के बाद उद्योगपतियों के साथ आयोजित बैठक में मुखर्जी ने कहा कि बजट को संसद में पारित कराना होता है। ऐसे में सांसदों के मूड को देखते हुये मुझे अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी है। मैंने अपने साथियों को भी इस संबंध में सावधानी बरतने को कहा। यही वजह है कि कई बातें जिन्हें बजट में होना चाहिये था अथवा किया जा सकता था, उन्हें नहीं किया गया।

राजनीतिक दलों के बीच नीतिगत बदलाव की बात को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा इन दिनों नीतिगत मामलों में फैसले बदलने में ज्यादा समय नहीं लगता। एक सदन में किया गया फैसला दूसरे सदन में पहुंचने पर 24 घंटे के भीतर ही पलट जाता है। संप्रग की गठबंधन सरकार जिसके पास राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं है, को कई बार अपने कुछ गठबंधन सहयोगियों की वजह से मुश्किल का सामना करना पड़ा है।

बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी मिलने में देरी को लेकर चिंता के बारे में मुखर्जी ने कहा कि सरकार इसमें लगने वाली समय-सीमा घटाने की कोशिश कर रही है ताकि परियोजनाओं को जल्दी अनुमति मिल सके। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मामले खासकर पर्यावरण मंजूरी से संबद्ध मसलों के हल में तेजी लाने के लिये मंत्री समूह की एक समिति बनाई है।

पेट्रोलियम पदार्थों पर बढ़ती सब्सिडी पर चिंता व्यक्त करते हुये वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार को राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों तथा संबंद्ध पक्षों की मदद से इस मुद्दे को सुलझाना होगा। खाद्य, ईंधन, उर्वरक जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सब्सिडी 2012-13 में 1.79 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो चालू वित्त वर्ष के 2.08 लाख करोड़ रुपये से कम है। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार डीजल तथा एलपीजी गैस के मामले में बाजार आधारित मूल्य व्यवस्था के लिये बाध्य हो सकती है।

उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिसका हमें समाधान करना होगा और बजटीय उपाय इसका एकमात्र समाधान नहीं है। बजट और प्रशासनिक फैसलों से बाहर अन्य कई फैसले करने होंगें इसके लिये राजनीतिक दलों, राज्य सरकार के साथ सहमति जरूरी है। मुखर्जी ने यह स्पष्ट किया कि सरकार के लिये सब्सिडी के बढ़ते बोझ का वहन करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि क्या कोई देश ऊंची कीमत पर 10 से 12 करोड़ टन कच्चा तेल आयात करते रहने का बोझ उठा सकता है, हमें मिलकर इस मसले का हल करना होगा।

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि के बावजूद सरकार ने डीजल, केरोसीन तथा एलपीजी गैस की कीमतें नहीं बढ़ायी है। पेट्रोल की कीमत 2010 में नियंत्रण मुक्त किया गया लेकिन डीजल के मूल्य के बारे में सरकार अबतक निर्णय नहीं कर पायी है। विश्व बाजार में कच्चे तेल का दाम 125 डालर तक पहुंच चुका है। ऊंची सब्सिडी से सरकार का रोजाकोषीय घाटा बढ़ रहा है।

उन्होंने उम्मीद जतायी कि प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) कानून 2012-13 में आ जाएगा लेकिन यह एक अप्रैल 2013 से ही प्रभावी हो पाएगा। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बारे में वित्त मंत्री ने कानून को जल्दी लागू करने के लिये राजनीतिक आमसहमति पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिये संविधान संशोधन विधेयक पारित होना जरूरी है। इसमें दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत चाहिये, सरकार इसके लिये प्रयास कर रही है।

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