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आर्थिक स्थिति मजबूत, अगले वित्त वर्ष से लौटेगी रंगत

आर्थिक स्थिति मजबूत, अगले वित्त वर्ष से लौटेगी रंगत

सरकार ने कहा है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजूबत स्थिति में है। उम्मीद है कि अगले वित्त वर्ष से यह फिर से अपने पुराने रंग में आने लगेगी।

सरकार की तरफ से गुरुवार को संसद में पेश वर्ष 2011-12 के आर्थिक सर्वेक्षण में अगले वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद [जीडीपी] 7.6 प्रतिशत और इसके बाद इसके 8.6 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। सर्वेक्षण में चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी के 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। मंहगाई को लेकर लगातार दबाव में रही सरकार ने उम्मीद जताई है कि अब इसमें गिरावट का रुख है और इससे अर्थव्यवस्था को एकबार फिर बल मिलेगा।
 
अर्थव्यवस्था की इस गुलाबी तस्वीर के बीच सरकार के समक्ष वित्तीय घाटे को लक्ष्य के दायरे में रखने की कोशिश है और वित्त वर्ष 2011-12 के बजट में इसके जीडीपी के 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। सरकार ने कृषि एवं सेवा क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन करने का हवाला देते हुए कहा है कि कृषि क्षेत्र में 2.5 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। सेवा क्षेत्र में 9.4 प्रतिशत की दर से बढो़तरी होगी और जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 59 प्रतिशत तक बढी़ है।
 
आर्थिक वसूली में सुधार जारी रहने के मद्देनजर औद्योगिक वृद्धि दर चार से पांच प्रतिशत तक रहने की संभावना जताई गई है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा लोकसभा में पेश सर्वेक्षण में सरकार ने कहा है कि औद्योगिक वृद्धि में सुस्ती आने से चालू वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वर्ष 2008-09 में जीडीपी बढो़तरी 6.7 प्रतिशत रही थी। सरकार ने कहा कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहतर है और अगले वित्त वर्ष में जीडीपी विकास दर 7.6 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2013-14 में इसके 8.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
 
इसमें कहा गया है कि यूरो मंडल में ऋण संकट और कई देशों की साख घटाए जाने से सितंबर 2011 में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अचानक मंदी के बादल छाने लगे। भारतीय अर्थव्यवस्था इस वैश्विक घटनाक्रम के साथ ही घरेलू कारकों से प्रभावित हुई है। इसमें कहा गया है कि वैश्विक आर्थिक स्थिति अभी भी बेहतर नहीं है और जी 20 देशों को पहल करने की जरूरत है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि औद्योगिक विकास दर में शिथिलता आने के बावजूद कृषि और सेवा क्षेत्रों का प्रदर्शन बेहतर है और सेवा क्षेत्रों की जीडीपी में हिस्सेदारी वर्ष 2010-11 में 58 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2011-12 में 59 प्रतिशत पर पहुंच गई। इसी तरह से कृषि और उससे जुडे़ क्षेत्रों की विकास दर 2.5 प्रतिशत रहेगी।

औद्योगिक विकास दर चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से दिसंबर तक मात्र 3.6 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वित्त वर्ष की आलोच्य अवधि में यह दर 8.3 प्रतिशत रही थी। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य मुद्रास्फीति चालू वित्त वर्ष में अधिकांश समय ऊंची बनी रही। हालांकि अंतिम महीनों में कीमतों की वृद्धि पर लगाम लगा है। खाद्य मुद्रास्फीति में तेजी से गिरावट आई है और मुद्रास्फीति में तेजी मुख्यत: गैर खाद्य विनिर्मित वस्तुओं की वजह से रही। रिजर्व बैंक ने कठोर मौद्रिक उपायों के जरिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने का प्रयास किया और मुद्रास्फीति के दबाव को काफी हद तक कम किया।
 
हांलाकि इसमें कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष में निवेश में कमी आएगी। चालू वित्त वर्ष में ब्याज दरों में बढो़तरी हुई है जिससे ऋण महंगा हुआ है। इसके साथ लागत बढ़ने से मुनाफे पर दबाव बढा है और इसका असर आंतरिक संसाधन पर पडा़ है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि बचत खाता पर ब्याज को नियंत्रण मुक्त करने से वित्तीय बचत में बढो़तरी होगी और इससे मौद्रिक स्थिति सुदृढ़ होगी। सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश का विदेश व्यापार अभी भी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में निर्यात वृद्धि दर 40.5 प्रतिशत रही थी लेकिन इसके बाद से इसमें गिरावट आने लगी है। हालांकि चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से दिसंबर तक आयात में 30.4 प्रतिशत की दर से बढोतरी हुई है।

सर्वेक्षण में सरकार ने कृषि क्षेत्र में 2.5 प्रतिशत की वृद्धि होने का हवाला देते हुए कहा है कि कृषि उत्पादों की फसल कटाई अवसंचरना में महत्वपूर्ण निवेश अंतरों को ध्यान में रखते हुए संगठित व्यापार और कृषि को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश [एफडीआई] को प्रभावी रूप से प्रोत्साहित किए जाने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि सरकार को खाद्यान्नों के लिए आधुनिक भंडारण सुविधाओं का निर्माण करने के लिए कदम उठाने चाहिए।
 
खराब होने वाली खाद्य पदार्थों को कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम के दायरे से बाहर रखने की वकालत करते हुए कहा गया है कि नियामक मंडियां कभी कभी खुदरा व्यापारियों को किसानों के साथ जोड़ने से रोकती है। खराब होने वाली वस्तुओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें इस अधिनियम से मुक्त रखना होगा। इसमें कहा गया है कि अंतर राज्य व्यापार को बढा़वा देने के लिए किसी जिंस पर एक बार बाजार शुल्क लगने के बाद अन्य राज्यों में उसके व्यापार सहित किसी अन्य बाजार में दोबारा शुल्क नहीं लगाया जाना चाहिए। केवल सेवाओं से संबंधित उपभोक्ता प्रभार ही उसके बाद के लेनदेन पर लगाए जाएं।
 
सर्वेक्षण में उन्नत मंडी व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि व्यापारियों को अधिक संख्या में मंडियों का एजेंट बनने की अनुमति दी जानी चाहिए। कृषि उत्पाद विपणन समिति और इसके बाहर से जो कोई भी बेहतर मूल्य और शर्त प्राप्त कर सके उसे ऐसा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उपभोक्ताओं के लिए बेहतर सामग्री की आपूर्ति के उद्देश्य से विशेष फसल उत्पादन करने वाले राज्यों, क्षेत्रों में विशेष बाजार स्थापित किए जाने की बात भी कही गई है।

सरकार ने कहा है कि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश में महत्वपूर्ण बढो़तरी हुई है और वर्ष 2010-11 में इस पर व्यय बढ़कर 96672.79 करोड़ रुपए हो गया। स्वास्थ्य क्षेत्र में संसाधन आवंटन में बढो़तरी के अतिरिक्त सरकार गरीबों और हाशिए पर रह रहे श्रमिकों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के माध्यम से सार्वजनिक तथा निजी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का विस्तार करके इसमें मनरेगा लाभार्थियों और बीडी श्रमिकों को शामिल किया जा रहा है।

शिक्षा पर बजटीय आवंटन में बढो़तरी का हवाला देते हुए सरकार ने कहा है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम और शैक्षणिक सहायताओं में बढो़तरी की वजह से स्कूली शिक्षा अधूरी छोड़ने वाले बच्चों की संख्या वर्ष 2005 में 134.6 लाख थी, जो वर्ष 2009 में घटकर 81.5 लाख रह गई। सर्वेक्षण में कहा गया है कि सितंबर 2009 से रोजगार में वृद्धि हुई जो अभी जारी है। चुंनीदा क्षेत्रों तथा परिधान सहित चमडा़, धातु, आटोमोबाइल, रत्न और आभूषण, परिहवन सूचना प्रौद्योगिकी, बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग तथा हथकरधा पारवमूल क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढे़ हैं।
 
इसमें कहा गया है कि सितंबर 2011 में समग्र रोजगार सितंबर 2010 की तुलना में नौ लाख 11 हजार बढे़। इस अवधि में आईटी, बीपीओ क्षेत्र में सबसे अधिक सात लाख 96 हजार रोजगार वृद्धि हुई। इसके बाद धातु में एक लाख सात हजार, आटोमोबाइल में 71 हजार, रत्न एवं आभूषण में आठ हजार और चमडा़ उद्योग में सात हजार रोजगार की बढो़तरी दर्ज की गई है। सर्वेक्षण के अनुसार सरकारी और निजी क्षेत्रों सहित संगठित क्षेत्र में वर्ष 2010 के दौरान रोजगार में 1.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो इससे पिछले वर्ष से कम है। निजी क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर सरकारी क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक रही। संगठित क्षेत्र में रोजगार में महिलाओं की हिस्सेदारी मार्च 2010 के अंत में 20.4 प्रतिशत थी और हाल के वर्षों में यह लगभग स्थिर रही है।

सर्वेक्षण में राजकोषीय घाटे का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि 2008 में यह जीडीपी का 2.0 प्रतिशत पर था, लेकिन वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह से विभिन्न प्रोत्साहन पैकजों की वजह से 2009 में यह बढ़कर 6.7 प्रतिशत पर पहुंच गया। हालांकि इसके बाद से इसमें गिरावट का रुख बना हुआ है और 2010 में यह जीडीपी का 5.5 प्रतिशत. वर्ष 2011 में 4.6 प्रतिशत और 2012 में इसके 4.1 प्रतिशत पर आने का अनुमान है। इसमें कहा गया है कि विकसित देशों में 2010 में यह 7.6 प्रतिशत और 2011 में 6.6 प्रतिशत रहने की संभावना है।
 
सर्वेक्षण में कहा गया है कि कमजोर वैश्विक आर्थिक संभावनाओं और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अनिश्चितताओं के कारण बैंकों और कॉपरेरेट के लिए विदेशी धन की उपलब्धता और लागत पर रिणात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली की सराहना करते हुए कहा गया है कि वैश्विक मंदी के कारण आई गिरावट से उबरने के रुझान के साथ ही सार्वजनिक और निजी दोनों ही बैंकिंग क्षेत्रों ने वर्ष 2010-11 के दौरान प्राथमिक क्षेत्र ऋण अदायगी में प्रभावी वृद्धि दिखलाई है।

कृषि ऋण की मांग उत्तरी क्षेत्र में अधिक रही है और 125 लाख नए किसान बैंकिंग प्रणाली से जोडे़ गए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की 98 प्रतिशत शाखाएं पूर्ण कंप्यूटरीकृत हो चुकी हैं और वर्ष 2010-11 में एटीएम मशीनों की संख्या में भी बढो़तरी हुई है। इसमें कहा गया है कि अप्रैल 2012 से शुरू हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में काबर्न उत्सर्जन में कमी लाने पर विशेष रूप से जोर दिया जाना चाहिए। हालांकि भारत की प्रति व्यक्ति व्यक्ति काबर्न डाईआक्साइड उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में काफी कम 1.52 कार्बन डाईआक्साइड टन है। इसे वर्ष 2020 तक वर्ष 2005 के स्तर से 20 से 25 प्रतिशत तक कमी लाने की पहले की घोषणा की जा चुकी है।

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