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अखिलेश का कॉलेज से सत्ता के गलियारों तक का सफर

अखिलेश का कॉलेज से सत्ता के गलियारों तक का सफर

उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) को पहली बार मिले पूर्ण बहुमत के नायक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष युवा सांसद 38 वर्षीय अखिलेश यादव का सफर किसी परीकथा से कम नहीं है।

सियासी घराने की परम्पराओं और अनुशासनयुक्त संस्कारों की थाती लिये प्रदेश के नये यूथ आइकॉन अखिलेश के अपने पिता मुलायम सिंह यादव की सत्ताशीर्ष की विरासत इतनी जल्दी सम्भालने के बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा।

कभी राजनीति से दूर रहकर व्यवसाय करने का इरादा बनाने वाले पर्यावरण इंजीनियर अखिलेश का सियासी सफर किसी परीकथा की तरह है। चीजों को सियासत के चश्मे से नहीं देखने के आदी रहे इस 38 वर्षीय नेता ने बमुश्किल छह माह पहले प्रदेश की सियासी जलवायु में बदलाव के लिये अपनी समाजवादी क्रांतिरथ यात्रा कर प्रदेश को मथना शुरू किया।

इस दौरान अखिलेश एक ऐसे परिपक्व राजनेता के रूप में उभरे जिसने ठेठ गंवई सियासत की छवि वाली पार्टी को गांवों के चौबारों और बैठकों के साथ-साथ शहरों के ड्राइंगरूम तक भी पहुंचाया तथा अपनी पार्टी की चाल और चेहरे के साथ-साथ तकदीर भी बदल डाली।

बेहद सौम्य और संस्कारवान व्यक्ति की छवि वाले अखिलेश चुनावी समर से पहले और उसके दौरान एक मजबूत इरादे वाले दृढ़ राजनेता के तौर पर भी सामने आये। पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खां की पैरवी के बावजूद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेता डी पी यादव को दल में शामिल नहीं करने के दृढ़ फैसले और चुनाव टिकट वितरण में मजबूत हस्तक्षेप से उनकी छवि और पक्की हो गयी।

विधानसभा चुनाव में सपा को पहली बार 224 सीटों के रूप में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद अखिलेश को 10 मार्च को पार्टी विधायक दल ने अपना नेता चुन लिया और आज मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर उन्होंने प्रदेश के इतिहास में सबसे युवा वजीर-ए-आला बन नया इतिहास रच दिया।

अखिलेश का जन्म एक जुलाई 1973 को इटावा में हुआ था। उस वक्त उनके पिता मुलायम सिंह यादव प्रदेश की राजनीति में पैर जमा रहे थे।

अनुशासन के पाबंद पिता मुलायम ने अखिलेश को प्रारम्भिक शिक्षा के लिए राजस्थान के धौलपुर सैनिक स्कूल भेजा, जहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से पर्यावरणीय प्रौद्योगिकी में स्नातक और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय से परास्नातक की उपाधि हासिल की।

युवा अखिलेश सिडनी से पढा़ई पूरी करके पहुंचे तो राजनीति उनकी प्रतीक्षा कर रही थी और वर्ष 2000 में उन्होंने पहली बार कन्नौज लोकसभा सीट से उपचुनाव जीत कर सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वह सीट पिता मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से खाली हुई थी जो 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में मैनपुरी और कन्नौज दोनों ही सीटों से चुने गये थे। उसके बाद से अखिलेश लगातार कन्नौज लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

बढ़ती उम्र और राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती व्यस्तता के बीच कुछ वर्षों पहले पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने पार्टी की प्रदेश इकाई के नेतृत्व की जिम्मेदारी नौजवान बेटे अखिलेश के कंधे पर डाल दी और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई।

राज्य की 16वीं विधानसभा के चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही अखिलेश ने कभी क्रांति रथ यात्रा तो कभी पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल से युवकों और समर्थकों की यात्राएं निकाल कर पूरे प्रदेश को छान डाला।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, प्रदेश में पार्टी को जमाने और समाजवाद का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए अखिलेश ने दस हजार किलोमीटर की यात्रााएं की और 800 से अधिक रैलियों को संबोधित किया।

सिर पर पार्टी की लाल टोपी, सफेद कुर्ते पैजामे पर काले रंग की सदरी में संयत, विनम्र मगर दृढसंकल्प भाषणों के जरिये युवा अखिलेश ने देखते ही देखते स्वयं को प्रदेश की राजनीति का सबसे जाना पहचाना चेहरा बना लिया।

प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के करिश्मे की उम्मीदों के बीच अखिलेश समर्थकों के बीच एक नयी आशा के रूप में उभरे और जब छह मार्च को विधानसभा चुनाव के लिए मतों की गिनती शुरू हुई तो दिन चढ़ने के साथ पार्टी की स्थिति निरंतर मजबूत होती गयी और शाम ढलने तक 403 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी की 224 सीटों पर जीत के शानदार बहुमत के साथ प्रदेश के राजनीतिक आकाश में एक नये सूरज का उदय हो चुका था।

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