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धन-बल के लिए शंकराचार्यो की भरमारं

ुछ संतों को भी धन, गाड़ी, भीड़ और ताकत चाहिए। इस होड़ के चलते ही शंकराचार्यो और पीठाधीश्वरों की भरमार हो रही है। हिन्दुओं के सिर्फ चार शंकराचार्य हो सकते हैं। काँची कामकोटि को भी पीठ में गिना जाता है। यहाँ भी शंकराचार्य होते हैं। लेकिन यह संख्या सौ के पार पहँुच गई है। पीठाधीश्वरों की तो भरमार है। दयानन्द के स्वयंभू शंकराचार्य बनने की कथा ने उन लोगों के चेहर बेनकाब किए हैं जो फर्जी शंकराचार्य बनकर समाज के बीच बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं।ड्ढr अयोध्या, चित्रकूट, मथुरा, वाराणसी, हरिद्वार और अन्य धार्मिक स्थानों में ही नहीं,तमाम जिलों में भी शंकराचार्य पैदा हो गए हैं। इस मामले पर अब यह बहस चल रही है कि आखिर स्वयंभू शंकराचार्यो से कैसे निपटा जाए। अयोध्या के प्रसिद्ध विद्वान वासुदेवाचार्य का कहना है कि जैसे नित नए राजनीतिक दल बन बिगड़ रहे हैं उसी तरह शंकराचार्यो की स्थिति हो गई है। साधुओं में जिस तरह महत्वाकांक्षा और आपसी होड़ बढ़ी है। उससे शंकराचार्यो की बाढ़ आ गई है। काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष रामयत्न शुक्ल का कहना है कि चार शंकराचार्य हो सकते हैं। आदिगुरु ने जिन चार पीठों की स्थापना की है, शंकराचार्य वहीं हो सकते हैं। बाकी मनमाने ढंग से शंकराचार्य बने हुए हैं। जबकि वाराणसी के ही अन्य विद्वान कामेश्वर उपाध्याय का कहना है कि आदि गुरु इसलिए शंकराचार्य कहलाए क्योंकि उनका नाम शंकर था। उनके द्वारा बनाई गई चार पीठों व काँची कामकोटि में भी शंकराचार्य हो सकते हैं। वह कहते है काँची कामकोटि में आदिगुरु प्राण त्यागने के पहले काफी समय रहे थे। इसलिए पाचवाँ शंकराचार्य काँची कामकोटि का ही होता है। उन्होंने कहा कि इसके आगे जो भी अपने को शंकराचार्य बता रहे हैं या तो वह स्वयं भ्रम में हैं या जनता को भ्रम में डालना चाहते हैं। श्री रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्य गोपालदास यह कहकर बात टाल देते हैं कि पहले जनसंख्या कम थी इसलिए शंकराचार्य भी कम थे और पीठाधीश्वर भी। ं

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