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कानून नहीं, फिर भी पार्किंग शुल्क की वसूली

राजधानी में अगर वाहन लेकर निकलते हैं तो आपको जेब भी ढीली करनी पड़ेगी। न कोई नियम और न ही कानून। फिर भी पार्किंग के नाम पर वसूला जाता है शुल्क। बाकायदा मेंटिनेंस शुल्क आदि लिखा पर्ची के साथ। एक तो सरकारी पार्किंग स्थल की कमी और उस पर से वाहनों की बेहिसाब तादाद। आलम यह है कि शहर में ‘ट्विन टावर, हरिनिवास, एल.एन.मिश्रा इंस्टीच्यूट समेत ऐसे कई आलीशान मार्केट और कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स परिसर व अन्य संस्थान हैं जहां पार्किंग के नाम पर हर रोज लोगों से हजारों की वसूली होती है। मनमाना शुल्क। कहीं मोटरसाइकिल के दो रुपये तो कहीं तीन या पांच। साइकिल लगाने का भी शुल्क एक से लेकर दो रुपये तक होता है। कहीं यह शुल्क चार घंटे का तो कहीं छह घंटे के लिए।ड्ढr ड्ढr सवाल यह है कि इन जगहों पर क्या शुल्क लेने का प्रावधान है? अगर हां तो राशि में असमानता क्यों? अगर नहीं तो फिर वसूली कैसी? इस बाबत नगर आयुक्त विश्वनाथ सिंह ने बताया कि सड़क किनार सरकारी जमीन पर तो हमारा अधिकार है पर प्राइवेट कॉम्प्लेक्स या अन्य निजी संस्थानों के परिसर में नगर निगम हस्तक्षेप नहीं कर सकता। राज्य में अभी तक इस बार में कोई कानून नहीं है।ड्ढr ड्ढr शहर में निगम द्वारा घोषित डेढ़ दर्जन पार्किंग स्थल व टेम्पो स्टैंड हैं। इन जगहों के अलावा अन्य सरकारी स्थानों पर अवैध तरीके पार्किंग शुल्क वसूलने वाले लोगों को बेनकाब कर पुलिस से पकड़वाने की आवश्यकता है। हाइकोर्ट के आदेश पर कमिश्नर की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने ट्रैफिक की सुविधा के लिए रोड साइड में स्टैंड या पार्किंग नहीं बनाने को रिकोमेंड किया था। उन्हीं जगहों पर पार्किंग या स्टैंड की इजाजत दी गई है जिससे यातायात प्रभावित नहीं हो। दूसरी तरफ ट्रैफिक एस.पी. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने गांधी मैदान व डाकबंगला इलाके में कुछ कॉम्प्लेक्स व अन्य संस्थानों के परिसर से सटे सड़क किनार भी अवैध तरीके से वाहन पार्किंग और शुल्क वसूली के संबंध में छानबीन कराने की बात कही है। उन्होंने कहा कि सड़क किनार सिर्फ नगर निगम की इजाजत से ही पार्किंग स्थल हो सकता है।

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