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बेमिसाल द्रविड़

इन दिनों खेल में ‘लीजेंड’ शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन वास्तव में कोई एक खिलाड़ी इसका हकदार है, तो वह हैं हिन्दुस्तानी क्रिकेटर राहुल द्रविड़। 9 मार्च को उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का अंत हो गया। तेंदुलकर की तरह द्रविड़ को कभी ढेरों विज्ञापन नहीं मिले, और न ही उनका अंदाज सहवाग जैसा विस्फोटक था। मैदान पर वह गांगुली की तरह आक्रामक भी नहीं दिखते थे। बावजूद इसके द्रविड़ ने साल 1996 में खेले गए अपने पहले टेस्ट मैच में ही इंग्लैंड के खिलाफ  95 रनों की पारी से यह साफ कर दिया था कि टीम इंडिया का मिडिल ऑर्डर आने वाले वर्षो में उनके इर्द-गिर्द होगा। आंकड़े कभी पूरी कहानी बयां नहीं करते, पर 52 के औसत से टेस्ट क्रिकेट में 36 शतक उनके बेमिसाल खेल की कहानी कहते हैं। 

द्रविड़ जिस तकनीकी कलात्मकता के साथ क्रिकेट खेलते थे, उससे उनकी शोहरत दुनिया भर में फैली। एक ऐसी टीम, जिसके खिलाड़ी अपने गुमान में रहते हैं, किसी ने राहुल के बारे में दो खराब शब्द कभी नहीं कहे। द्रविड़ में जन्मजात विनम्रता थी और अपनी बातों को मजबूती से रखने का माद्दा भी। पिछले साल ही मेलबर्न में ‘ब्रेडमैन एड्रेस’ के मौके पर उन्होंने अपना मोहक भाषण दिया था। यह सम्मान पाने वाले वह पहले गैर-ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर थे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी तरह का कोई और बल्लेबाज उभर आए, यह मुमकिन नहीं जान पड़ता। उनकी क्लासिकल बैटिंग लॉर्डस के परंपरागत स्कूल की मानिंद है, हालांकि ट्वंटी-20 के इस दौर में इसे वक्त की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता। बहरहाल, इसकी आशंका बढ़ गई है कि क्रिकेटर, खास तौर पर हिन्दुस्तानी क्रिकेटर जिस तेजी से सुपरस्टार बनते जा रहे हैं, वे शालीन भी बने रहेंगे, पर द्रविड़ के लिए यह कोई मुद्दा नहीं था। द्रविड़ बुरे हालात में ज्यादा निखरकर सामने आते थे। 1997 में दक्षिण अफ्रीका व 2011 में इंग्लैंड दौरे पर उनकी बेहतरीन पारियों ने न केवल हिन्दुस्तानी टीम की लाज बचाई, बल्कि यह भी साबित किया कि वह किसी भी हालत में हार नहीं मानते। अब हमें भले ही उनका लाजवाब खेल देखने को न मिले, पर इस महान खिलाड़ी का कद हमेशा बना रहेगा।
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून, पाकिस्तान

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