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ओबामा और हम

भी कहते थे कि बंगाल जो आज सोचता है, बाकी देश कल वही सोचता है। आज अमेरिका के बारे में भी दुनिया का यही ख्याल है। ज्यादातर का विचार है कि अमेरिकन जीवन-दर्शन, रहन-सहन, शिक्षा, शीतल पेय, पोशाक, खान-पान, अर्थव्यवस्था, डॉलर वगैरह पूरे संसार में आला है। बाकी उसकी फूहड़ नकल हैं। दुनिया की नम्बर वन ताकत कोई है तो अमेरिका है। उसी के भरोसे वह कभी इधर धौंस देता है, कभी उधर। जब चाहे हड़का लिया, कभी पाकिस्तान को, कभी ईरान को। छींक अमेरिका को आती है, नजला ईरान, इराक या अफगानिस्तान पर गिरता है। यह दीगर है कि बंगाल के वामपंथी इस राय के नहीं हैं। उनकी वक्त की सुई दसअसल माक्र्स-लेनिन पर टिक गई है। जब से उनका आदर्श रूस बिखरा है, वह चीन को महाशक्ित बनाने पर उतारू हैं। अमेरिकन राष्ट्रपति के चुनाव के बाद ओबामा ने खुद को संसार का सियासी गामा साबित किया है। अमेरिका में कुछ हो और उसका असर भारत पर न हो, यह कैसे मुमकिन है? हिन्दुस्तान एक धर्म-प्रधान देश है। जब से सुना है कि ओबामा की जेब में हनुमानजी की एक नन्हीं मूरत हमेशा विराजमान रहती है, पवनपुत्र के भक्तों में गजब का क्षाफा हुआ है। ओबामा की चुनावी विजय जय हनुमान की जयकार से जुड़ गई है। हनुमान मंदिर का पुजारी गदगद है। प्रसाद का दैनिक चढ़ावा लगातार तरक्की पर है। पुजारी एक अन्य मंदिर के पास अपनी निजी मिठाई की दुकान खोलने की योजना बना रहा है। इस मंदिर के बासी प्रसाद को ताजा बताकर उसमें बेचा जाएगा। उसका बेरोगार अनपढ़ लड़का धंधे से लगेगा। दूसर दुकानदारों से उसकी मिठाई सस्ती होगी। उसे ग्राहक मानसिकता पता है। हाथों हाथ बिकेगा प्रसाद। कांग्रेसी खुश हैं। ओबामा महात्मा गांधी के प्रशंसक हैं। जब अमेरिका साथ है तो चुनावी समर में कांग्रेस को कौन चित करगा भला? भाजपा संतुष्ट है। अमेरिका में परिवर्तन आया है तो भारत में भी आएगा। उनका राष्ट्रपति युवा है, भाजपा का प्रत्याशी वयोवृद्ध, तो क्या हुआ? हमारी परम्परा अलग है। भारत की सियासत में नेता तीस-चालीस की उम्र के बाद बमुश्किल पैदा होता है। भारतीय मान्यता है कि उम्रदार नेता, गुरु और शराब लाजवाब हैं। पिछड़े और दलित नेताओं की भी बांछें खिली हैं। अमेरिका से बराबरी करनी है तो पी. एम. उन्हीं में से एक को बनना है। सत्ता से निष्कासित संत राजा मान्डा का दावा है कि ओबामा ने उनका ही अनुकरण कर चुनाव जीता है। आज अमेरिका कर रहा है, कल दुनिया उनकी नकल करगी।

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