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लोकतंत्र में नया ‘अर्थात’ चाहती कविता: परमानंद

सुप्रसिद्ध आलोचक एवं कवि प्रो परमानंद श्रीवास्तव ने कहा है कि कविता आज के लोकतंत्र में नया अर्थात चाहती है। ‘कविता का अर्थात’ हमारे समय का काव्य विमर्श है। वह एकस्वरता का प्रतिवाद है। प्रो. श्रीवास्तव रविवार को दोपहर दो बजे अपने आवास पर प्रतिष्ठित केके बिरला फाउण्डेशन का वर्ष 2006 का व्यास सम्मान ग्रहण करने के बाद अपना विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कई पीढ़ियां कविता में हैं। युवा कविता की अपनी पहचान है। कविता स्थानीयता में रची- बसी है। मुक्ितबोध और रघुवीर सहाय हमार समकालीन जसे हैं, तो महमूद दरवेश भी। मै मानता हूं कि कविता तोड़फोड़ के क्रम में अपना नया अर्थात अर्जित करती है। वह छंद में हो या छंद के बाहर, गद्य ही आज की कविता का नियामक तत्व है। उन्होंने कहा कि कोई दो कवि एक जसा नहीं लिख रहे हैं। कविता का विषय आज कुछ भी हो सकता है-संतरा, मालेगाँव में विस्फोट या दक्षा पटेल। कविता का संगीत है तो कविता का अनगढपन भी। मामूलीपन में कविता अपना यर्थाथ पाती है। आज बाजारवाद के दौर में चीजों की अतिशयता है। पर कविता विरल है। हम कविता के लिए लम्बी प्रतीक्षा करते हैं। कविता में कविता बची रहे-चुनौती यह है। कविता का अटपटापन एक सार्थक युक्ित है। प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि कविता का अर्थात हमार समय का काव्य विमर्श है। वह एकस्वरता का प्रतिवाद है। जब आधुनिकता के अंत के साथ इतिहास के अंत, विचारधारा के अंत का शोर है, कविता चुपचाप दलित-स्त्री विमर्श को कविता में जगह दे रही है।

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