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बिहार के वरिष्ठ रंगकर्मी आरपी तरुण नहीं रहे

बिहार के वरिष्ठ रंगकर्मी आरपी तरुण नहीं रहे। 74 वर्ष की उम्र में रविवार की सुबह खगौल स्थित आवास पर हॉर्ट अटैक से उनका निधन हो गया। पटना व बिहार में थिएटर आंदोलन को आगे बढ़ाने में उनकी अह्म भूमिका रही है।

बिहार आर्ट थिएटर के संस्थापक सदस्यों में वे शामिल थे। दानापुर स्थित पीपा पुल के समीप गंगा घाट पर तरुण का अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि उनके बड़े पुत्र संजय वर्मा ने दी। उनका जन्म बांग्लादेश के लालमुनीर हाट में 1937 में हुआ था, लेकिन बंटवारे के बाद उनका पूरा परिवार खगौल में आकर बस गया।

इसके पहले बिहार आर्ट थिएटर के सचिव राजेन्द्र प्रसाद वर्मा उर्फ आरपी तरुण का पार्थिव शरीर रविवार को दोपहर में कालिदास रंगालय लाया गया, जहां रंगकर्मियों ने उन्हें आखिरी विदाई दी।

कालिदास रंगालय 50 वर्षो से उनकी कर्मभूमि रही थी। कुमार अनुपम, नीलेश मिश्र व प्रदीप गांगुली ने शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि थिएटर के प्रति तरुण जीवनभर समर्पित रहे। वह दो वर्षो से बीमार चल रहे थे।

स्व. अरुण कुमार मुखर्जी के साथ मिलकर उन्होंने वर्ष 1961 में बिहार आर्ट थिएटर की स्थापना की थी। हिन्दी, बांग्ला, अंग्रेजी, मैथिली, भोजपुरी, मगही,आदि भाषाओं में उन्होंने एक हजार से अधिक नाटकों का मंचन और अभिनय किया।

‘महात्मा गांधी का अंतिम एक वर्ष, पालकी, विप्लवी, जली खिचड़ी, भिखार का तमाशा, आषाढ़ का एक दिन, कारखाना आदि उनके चर्चित नाटकों में शामिल हैं। ‘महात्मा गांधी का अंतिम एक वर्ष’ में उन्होंने गांधी की भूमिका निभायी थी।

इसकी काफी चर्चा रही। वर्ष 1987 में जब वह अंतरराष्ट्रीय थिएटर कांग्रेस में भारत का प्रतिनिधित्व करने क्यूबा गए थे, तो उन्होंने गांधी के किरदार को स्टेज पर परफार्म किया था।

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