DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आक्रमकता से नहीं सुलझेगी यह समस्या

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के साथ हिंसक घटनाओं के पीछे ‘बीमारू’ राज्यों की भीषण गरीबी है। यह हिंसा इस देश की क्षेत्रीय आर्थिक विषमता के कारण जारी मानव पलायन की तार्किक परिणति है। यह समस्या पुरानी है। यह मानव निर्मित है। पर हाल में रेलवे भर्ती में कथित पक्षपात के कारण यह समस्या एक बार फिर उभर आई है। इसका निदान केंद्र सरकार के हाथों में है। पर, वह तो दो राज्यों के बीच राजनीतिक रस्साकसी में मात्र रेफरी की भूमिका अदा करती दिखाई पड़ रही है। इससे महाराष्ट्र और बिहार के नेताओं को अपने-अपने राज्यों में जन भावनाओं की लहर पर तैरने का मौका मिल रहा है। वैसे भी चुनाव करीब है तो नेताओं को ऐसे मुद्दे चाहिए ही। पर कुल मिलाकर इस तरह का अभियान देश की एकता के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे ‘बीमारू’ राज्यों के विकास के लिए भारी केंद्रीय आर्थिक मदद की जरूरत है। यह जरूरत काफी दिनों से महसूस की जाती रही है। दूसरी ओर रेलवे तथा अन्य केंद्रीय सेवाओं में स्थानीय उम्मीदवारों के लिए कुछ सीटें आरक्षित किए जान की भी आवश्यकता है। पर इन दो मुद्दों पर कोई ठोस कदम उठान के बदले केंद्र सरकार चुप है। केंद्र में जिस भी दल की सरकार रही हो, उसने क्षेत्रीय आर्थिक विषमता दूर करन की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए। नतीजतन आज विभिन्न राज्य आपस में मुठभेड़ की मुद्रा में हैं। महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के मुद्दे पर लगभग राजनीतिक सर्वसम्मति है। दूसरी ओर बिहार में भी इस मुद्दे के कारण ऐसे-ऐसे नेता एक मंच पर आ रहे हैं, जो अन्यथा एक दूसरे से लड़ते रहे हैं। यह भी कोई शुभ लक्षण नहीं है। विकास के लगभग सभी मानकों पर बिहार, देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे नीचे है। विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसा नहीं होता, यदि आजादी के बाद रेल भाड़ा समानीकरण नियम अविभाजित बिहार पर नहीं थोप दिया गया होता। खनिजबहुल झारखंड सन् 2000 तक बिहार का ही अंग था। देश का करीब आधे खनिज पदार्थ झारखंड में पाये जाते हैं। आजादी के बाद यह महसूस किया कि यदि खनिज पदार्थों को ढोने के लिए रेल भाड़ा समान नहीं होगा, तो सारे उद्योग बिहार में ही लग जाएंगे। इसलिए नियम बना कि धनबाद से खनिज पदार्थ पटना पहुंचान के लिए जितना रेल भाड़ा लगेगा, उतना ही रेल भाड़ा धनबाद से मुम्बई पहुंचाने में लगेगा। अब बिहार की जमीन से निकले खनिजों के आधार पर अधिकतर उद्योग बिहार के बाहर ही लग गए। जो उद्योग बिहार में लगे भी तो उस कंपनी का मुख्यालय मुम्बई और अन्य प्रदेशों में स्थापित कर दिए गए। इससे बिहार को केंद्रीय टैक्स में हिस्स का भी नुकसान हुआ। अब जब बिहार और झारख्ांड के लोग महाराष्ट्र में प्रताड़ित होते हैं तो बिहार के नेता रेलभाड़ा समानीकरण की याद दिलाते हैं। एक ताजा आकलन के अनुसार रेल भाड़ा समानीकरण के कारण सिर्फ एक खनिज पदार्थ के बाहर चले जान के कारण अविभाजित बिहार को एक लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। अन्य खनिज पदार्थों के मुतल्लिक आकलन जारी है। आज महाराष्ट्र के नेता मुम्बई रेलवे में बहालियों को लेकर बिहार से आए मौजूदा व पूर्व रेल मंत्रियों पर पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही शिव सेना और मनसे नेताओं का आरोप है कि मुम्बई में प्रत्येक दशक मराठियों की आबादी एक प्रतिशत की दर से घटती जा रही है। हिंदी भाषियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले दस साल से रेलमंत्री पद पर बिहार के ही नेता रहे हैं। अगर मान भी लें कि बिहार से बने रेल मंत्रियों ने रेलव की बहालियों में थोड़ा पक्षपात किया हो। पर, रेल भाड़ा समानीकरण के कारण बिहार का शोषण कर महाराष्ट्र को दिलाए गए भारी लाभ के बारे में कौन सोचेगा? कल्पना कीजिए कि बिहार में सन् 1में ठाकरे बंधुओं जैसा नेता होता तो रेल भाड़ा समानीकरण कैसे लागू हो पाता? आज भी झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन धमकी दे रहे हैं कि महाराष्ट्र की स्थिति नहीं सुधरी तो हम झारखंड से खनिज पदार्थ महाराष्ट्र नहीं जाने देंगे। एक जमाने में शिबू सोरेन ने भी दिक्कुओं यानी बाहरी लोगों के खिलाफ वैसा हीअभियान चलाया था, जिस तरह का अभियान ठाकरे बंधु चला रहे हैं। रेलव की नौकरियों में कथित बेईमानी को रोकन के लिए स्थानीय उम्मीदवारों के लिए कम स कम 50 प्रतिशत आरक्षण दिलाया जा सकता है। यह सच है कि अभी तो महाराष्ट्र वासियों को मुम्बई रेलवे में दस प्रतिशत भी नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं। शिव सेना नेता मनोहर जोशी के सवाल का क्या जवाब है कि ऐसी प्रतिभाएं बैंक और जीवन बीमा निगम की नौकरियां लेते समय कहां चली जाती हैं? वैसे उत्तर भारत से सिर्फ रेलव की नौकरियों के लिए ही लोग महाराष्ट्र नहीं जाते। अन्य कामकाज की तलाश में भी वहां जाते हैं। आज भी दूध और अखबार बेचने जैसे 48 तरह की सेवाएं देने का काम मुम्बई में हिंदी भाषी ही करते हैं। दरअसल, इस महाराष्ट्र-बिहार विवाद पर सम्यक, निरपेक्ष और संतुलित तरीके से विचार करके ही इसे स्थाई रूप से हल करना पड़ेगा। अन्यथा महाराष्ट्र में स्थाई रूप से बस गए उत्तर भारतीयों और उत्तर भारत में रह रहे महाराष्ट्रवासियों को हमेशा भय और आतंक के बीच जीना होगा। साथ ही ठाकरे बंधु जैसे अतिवादी दोनों राज्यों की राजनीति में हावी हो जाएंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस तर्क का भी केंद्र सरकार को अपन कर्म के जरिए जवाब देना होगा कि यदि बिहार से पैसे जाएंगे तो यहां से लोग भी जाएंगे। अनेक निजी और सरकारी कंपनियों के मुख्यालय मुम्बई में रहन के कारण उनसे प्राप्त केंद्रीय टैक्स में से राज्य को मिलने वाले हिस्स का लाभ महाराष्ट्र ही उठा लेता है। बिहार के नेता मांग कर रहे हैं कि उन मुख्यालयों को मुम्बई से हटा दिया जाए, यदि मुम्बई को सिर्फ महराष्ट्रवासियों का ही नगर बनाना है तो यह तर्क भी दमदार लगता है। पर शिव सेना नेता उद्धव ठाकरे की यह बात भी सही है कि बिहार और उत्तर प्रदेश से पलायन रोकन के लिए वहां के नेता उन राज्यों का आर्थिक विकास करें। हालांकि नीतीश सरकार इस काम में लगी हुई है, पर उसमें कुछ समय तो लगेगा ही। तब तक पलायन को पूरी तरह रोकना संभव नहीं होगा। लेकिन बिहार की तरफ से समस्या का यही सबसे अच्छा हल हो सकता है। क्या बिहार के नेता इस चुनौती को स्वीकार करंगे? लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: आक्रमकता से नहीं सुलझेगी यह समस्या