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6 दिसंबर, 2019|1:22|IST

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पर्यावरण: क्या अब गंगा मैली नहीं रहेगी?

गंगा के राष्ट्रीय नदी घोषित करने तथा इसके संरक्षण के लिए गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के गठन स करोड़ों लोगों की आस्थाओं के प्रतीक इस नदी के उद्धार की उम्मीद बलवती हुई है। बेहतरी की उम्मीद इसलिए भी है, क्योंकि प्राधिकरण के अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री होंगे। जिन राज्यों से यह नदी गुजरती है, उनके मुख्यमंत्री इसके सदस्य होंगे। मोटे तौर पर यह प्राधिकरण गंगा की सफाई व संरक्षण का मॉडल तैयार करन के साथ उसके क्रियान्वयन का भी मूल्यांकन करेगा। इसस कमान और नियंत्रण केन्द्रित हो गया है। यानी कई स्तरों पर गंगा की सफाई और उसके संरक्षण के लिए जो अभियान चल रहे हैं उनके बीच समन्वय कायम हो सकेगा। राष्ट्रीय नदी होन के कारण इस पर होने वाले खर्च वहन करन का दायित्व केन्द्र सरकार का होगा। तो क्या वाकई यह मान लिया जाए कि करोड़ों लोगों की भावनाओं और जीवन में रची-बसी गंगा अब वाकई पावन हो जाएगी? इसके रास्ते देश की करीब 37 प्रतिशत आबादी आ जाती है। देश की सिंचित भूमि का 40 प्रतिशत इसी से सिंचित होता है। नदियों से जुड़ीं आस्थाओं और धार्मिक मान्यताओं का संबंध वहां की जीवन शैली से होता है जो भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति से भी जुड़ा होता है। इससे एक सभ्यता डांवाडोल हुई है, पर्यावरण असंतुलित हुआ है। कुछ साल पहले तक इस आम मान्यता को वैज्ञानिक सहमति की मुहर थी कि गंगा के पानी में कभी कीड़े नहीं लगते, किंतु अब वैसी बात नहीं है। अब तो हरिद्वार जैस कर्मकांड के प्रमुख स्थान पर ही गंगा का पानी आचमन करने लायक नहीं रहा। पहले यह माना जाता था कि गंगा में प्रदूषण केवल मैदानी भागों में आता है लकिन अब बद्रिकाश्रम और गंगोत्री में ही प्रदूषण के प्रमाण मिले हैं। कारण आसपास के शहरों से आने वाले दूषित जल और मल हैं। ऋषिकेश और हरिद्वार का गंगाजल स्वाभाविक ही प्रदूषित है, क्योंकि यहां भी फैक््रिटयों का कचरा गंगा में गिरता है। फिर यमुना नदी इलाहाबाद में गंगा से मिलन के पूर्व बिल्कुल कचरा बन चुकी होती है। वैसे भी दुनिया की कई वैज्ञानिक रिपोटरें में गंगा के अस्तित्व तक पर खतरा मंडरान की बात कही जा रही है। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 नदियों में शामिल किया है जिनके अस्तित्व को सबसे ज्यादा खतरा है। गंगा के नष्ट होन का अर्थ है एक पूरी सभ्यता का अंत। किंतु सरकार की घोषणा मात्र से उत्साहित नहीं हुआ जा सकता। हमें सरकार के पिछले लक्ष्यों का जो हस्र् हुआ उसे नजरंदाज नहीं करना चाहिए। गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत 1में हुई और 1में इसका दूसरा चरण भी आरंभ हुआ, लकिन 01़71 करोड़ रुपया खर्च करके भी पहले चरण का ही काम पूरा नहीं हुआ। इस बीच गंगा साफ होन की जगह और ज्यादा मैली हुई है। उसके रास्ते में एक लाख से ज्यादा आबादी वाले 2शहर, 50 हजार से एक लाख के बीच वाले 23 शहर तथा 48 कस्बे हैं। गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में उत्तरप्रदेश, बिहार और प़ बंगाल के एक लाख से ज्यादा आबादी वाले 25 शहरों से प्रतिदिन सीवर और नालों से निकलने वाल करीब एक अरब 34 करोड़ लीटर गंदे जल में से 88 करोड़ 20 लाख लीटर को गंगा में न आने देने और उसे शुद्ध करन की योजना थी। इसे प्रथम चरण में 10 तक पूरा करना था। बाद में इसकी अवधि सन् 2000 तक बढ़ाई गई लकिन गंगा मैली ही रही। वस्तुत: केन्द्र ने ट्रीटमेंट प्लांट तो बना दिया लकिन राज्यों ने अपना दायित्व पूरा नहीं किया और केन्द्र भी उदासीन बना रहा। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के. जी़ बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ की टिप्पणी है कि गंगा 10 की तुलना में आज ज्यादा मैली है। उसके अनुसार कोई योजना क्रियान्वयन स्तर तक नहीं गई। पीठ ने पिछले वर्ष दिसंबर में गंगा संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए यह भी पूछा कि आखिर इतना रुपया गया कहां? गंगा एक्शन प्लान का मूल हेतु यही था कि कारखानों के अवशिष्ट, घरेलू कचरा, सीवर और नालों के पानी को गंगा में गिरने से रोका जाए। किसी भी नदी में मल, गंदा पानी गिरेगा, उसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। लकिन इसे नियंत्रित करना होगा। कहां, कितना और कैसे पानी गिरे इसे तय करन की जरुरत है। इनकी दिशा को दूसरी ओर मोड॥कर उनके शोधन का कार्य ईमानदारी से किया जाए तो गंगा काफी हद तक प्रदूषण मुक्त हो जाएगी। यह भी ध्यान रखना होगा कि गंगा से जुड़ी आबादी के सहयोग के बगैर इतना बड़ा लक्ष्य नहीं सध सकता। लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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