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पाप-बोध-2

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथक् विधम्,ड्ढr विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्रपंचमम्। गीता-1814ड्ढr अपने को कर्ता मानना वैसे भी ठीक नहीं। भगवान भी अपने को कर्ता नहीं मानते। उनके अनुसार प्रकृति सार कार्यो का संपादन करती है :ड्ढr प्रकृते: क्रियमाणानि गुण: कर्माणि सर्वश:,ड्ढr अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ताहं इति मन्यते।ड्ढr गीता- 327ड्ढr अपने को कर्ता मानना ही सब फसादों की जड़ है, गुनाह है, पाप है। इसलिए कर्तापन के अभिमान का त्याग करो किसी ‘प्रभु’ के चरणों में। इस भाव को आत्मसात कर निश्चिय ही पाप-बोध की यातना से मुक्त हो जाओगे। यही सभी धर्मो का सार है :ड्ढr यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्जस्य न लिप्यते,ड्ढr हत्वादि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते। गीता -1817ड्ढr इस मार्ग से दोनों को किसी हद तक शांति मिली। लेकिन पूरी शांति तो इन सूत्रों को आचरण में उतार कर ही संभव है।ड्ढr अब वे दोनों इस प्रसंग को दु:स्वप्न की तरह भूल चुके हैं। दोनों की गृहस्थी ठाठ से चल रही है, ऐसा मेरा अनुमान है।ड्ढr (अगले मंगलवार को जारी)ड्ढr 44. वह कौन थी?ड्ढr मुझे पढ़ने-पढ़ाने से ज्यादा कहीं मन नहीं लगता। इस काम में मुझे बेहद आनंद मिलता है। अरस्तू ने अध्ययन-अध्यापन केविरल आनंद की चर्चा करते हुए कहा है- ‘रीडिंग हैज इट्स ऑन प्रजर’। अपने क्लासों में कभी-कभी छात्रों को भी मैंने ऐसा तन्मय होते देखा है। अपने छात्र-छात्राओं के बीच इसकी चर्चा का अंदाज मुझे कई बार हुआ। एक खास प्रसंग कीचर्चा इसकी अच्छी गवाही दे सकती है।ड्ढr जीएलए कॉलेज में बीए ऑनर्स के छात्रों को मैं साहित्य-सिद्धांत के साथ पंत पढ़ाया करता था। प्रो केसरी कुमार हमलोगों को साहितय सिद्धांत और पंत पढ़ाते थे। उनकी पढ़ाई से मैं अब भी अपेन को समृद्ध महसूस करता हूं।पंतपर उनकी एक अच्छी किताब भी है- ‘पंत और उनका गूंजन’। वे उसी पुस्तक के लहजे में हमलोगों को पंत पढ़ाते थे। मैं उस शैली को आत्मसात करनेकी चेष्टा में था।ड्ढr एक दिन विभाग की कुछ छात्राओं के साथ एक नयी लड़कीमेर पास आयी और मेरा क्लास अटेंड करने की अनुमति मांगने लगी। उसका रंग-रूप,बात करने का सलीका, उसका स्निग्ध सौम्य देख-सुन कर मैं सहसा स्तब्ध रह गया।कौन थी वह लड़की? कहां से आयी थी? किस उद्देश्य से वह मेरा क्लास अटेंड करना चाहती थी? कई सवाल मेर मन में एक साथ घुमड़ रहे थे। लेकिन उससे कुछ पूछना मुझे प्राध्यापक की मर्यादा के विरुद्ध लग रहा था। वैसे मैं भीतर से फक्र अनुभव कर रहा था। तब सघन गंभीरता ओढ़ते हुए मैंने उससे कहा-विभागाध्यक्ष से पूछ लीजिये।ड्ढr विभागाध्यक्ष (डॉ जगदीश्वर प्रसाद) ने उसे अनुमति दे दी। उस दिन मैं सुमित्रानंद पंत की प्रसिद्ध कविता, ‘परिवर्तन’ पढ़ाना शुरू कर रहा था। पंत की यह कविता उनकी सबसे अधिक पूरी कविता लगती है मुझे। उनके संपूर्ण व्यक्ितत्व के केंद्र में खड़ी वह कविता उनके आगत और अनागत का आइना है। रियल कविता। अनुभूत कविता। उसका केंद्रबिंदु है :ड्ढr अचिर में चिर क अन्वेषण,ड्ढr विश्व का तत्वपूर्ण दर्शन।ड्ढr मुझे लगता है, पंत कीपूरी जिंदगी की कमाई? इन दो पंक्ितयों में समाहित है। ‘कुछ उक्षण टिके हुए’ मेन इसकी प्ररणा महसूस की जा सकती है।ड्ढr अस्तुउ, क्लास के बाद उस लड़की ने मुझसे मेर व्याख्यान से संबंधित कई प्रश्न पूछे। इससे मुझसे उसकी अध्ययनशीलता और प्रतिभा का भीोन हुआ।ड्ढr अब मुझे लगता है कि उस दिन-तिथि को मुझे नोट कर रखना चाहिए था। वह दिन मेर लिए मुग्धता का अविस्मरणीय दिन बन गया है। उसके रूप, गुण, लावण्य, उसका शील, उसका जूड़ा,खास कर उसकी स्मित नासिका मैं भूल नहीं पाता। गजब का संतुलन था उसके कउंटूरों में। पंत की उस कतिा का पाठ पूरा हो जाने के बाद वह फिर नहीं आयी। मैं उसे पंत की ‘भावी पदी’ पढ़ाने को उत्सकु था।पर, ऐसा कुछ हो न सका।ड्ढr हुआ कुछ दूसरा ही। मैं अपनी ‘गृहिनी’ में जिस तन्मयता का अनुभव करता था, वह एक सिर से गायब हो गया। उसमें मुझे हजार-हजार कमियां नजर आने लगीं। मैं चाहने लगा कि वह उसी की तरह मेकअप कर, पढ़े, उसी की तरह कंधे पर बैग लटका कर मेर साथ चले, मेरा पूरक बने। संछेप यह कि मेरी गति ‘कीट-मृंग’ की होने लगी। मैं उसे एक क्षण भी नहीं भूल पाता। उसकी छवि मुझे स्पंदित करती रहती। उस सौंदर्य-सत्ता को क्या किसी अदृश्य शक्ित ने भेजा था?ड्ढr एकांत क्षणों में मैं अब भी उसे याद कर तन्मय हो उठता है। कौन सी वह लड़की? कहां से आयी थी? क्यों आयी थी?मेर क्लास से उसे क्या मिला? मैं नहीं जानता। पर इतना जानता हूं कि वह मेर लिए सौंदर्य-बोध की एक जीवंत प्रतिभा बन गयी है- बर्डस्वर्थ की लूसी ग्र या ब्राउनिंग की प्रोफीरिया की तरह।ड्ढr अपनी कई कविताओं, रचनाओं में मैंने उस ‘सौंदर्य-बोध’ के अनुसृजन का प्रयास किया है। ‘ऊं विश्वविद्यालय नम:’ की ‘स्मितनासिका’ उसी छवि का रूपांतरण है। उसे पढ़ कर आप उसके प्रति मेर अविरल मुग्धता का आस्वाद ले सकते हैं। ड्ढr 45. दुर्दम संकटों के बादलड्ढr सब दिन एक से नहीं होते। शिशिर- बसंत का तारतम्य समझतेहुएउ भी दुख सहा नहीं जाता। मुझ पर मुसीबतों का पहाड़ टूटने लगा। दुर्दम संकों के बादल एक पर एक घिरने लगे। मेरा पूरा परिवर तहस-नहस हो रहा था। पहले तो खेती-बारी, बीजनेस-व्यापार ध्वस्त हुआ, फिर मेलानी के आसपास की हमारी सारी जमीन पतरातू डैम में डूबने लगी। कंपेनसेसन केबनाम पर कई विवाद उठ खड़े हुए। हजारीबाग कोर्ट कोचक्कर लगाते पिताजी पस्त हो रहे थे।पैसों का अभाव था। दुश्मनों से झगड़ा-झंझट,मारपीट की नौबत आनेलगी। हर समय खतरा। पिताजी का पत्र पढ़ते मुझे डर लगता।ड्ढr गांव में चेचक का प्रकोप। अबोध बच्चे कालकवलित हो रहे थे। साथी किसुन के तीन बच्चे एक-एक कर कुछ ही दिनों के अंदर एक ही जगह, अगल-बगल दफन कर दिये गये। दशहर की छुट्टी में घर आने पर मैं अपनी आंखों से यह दुर्दशा देख रहा था। कुछ नागपुरी गीत- कविताओं में मैंने इन यातनाओं को व्यक्त करने कीचेष्टा की है। ‘सत्यार्चन’ में उनका संकलन है।ड्ढr पिताजी ने मुझे सलाह दी, पंडितजी से दिन दिखाकर शुभ मुहूर्त में डालटनगंज जाना। अभी गर्दिश के दिन हैं हमार। सावधान रहना चाहिए। मैं पिताजी की चिंता समझ रहा था। लेकिन अपने मन के विरुद्ध चलना मेर लिए मुश्किल था। मन अड़ा- भाग्य और भगवान क्या करंगे? जो होना है, वह होगा। परिस्थितियां जहां ले जाना चाहती है, वहां अनचाहे भी जाना होगा। पंडितजी से क्या पूछना? (बचपन में ज्योतिषीजी के प्रति उपजा अविश्वास मेर मन में फन काढ़े बैठा था)ड्ढr मैं डालटनगंज लौट आया। मेर छोटे बच्चे, मात्र डेढ़ साल के सरोज को हल्की सर्दी-खांसी शुरू हुई। बुखार हुआ। लिर पेट खराब। दवा का असर न होते देख मैं विचलित होने लगा। मेरा मन पीपर के पत्ते की तरह डोल रहा था। लोगों ने जो-जो उपचार, नेग-जोग बताये, सब किया। डालटनगंज के नामी ज्योतिषी विजय सरस्वती ने कहा- कष्ट है पर निवारण हो जायेगा। डाक्टर ने कहा- चिंता की बात नहीं, सब ठीक हो जायेगा।ड्ढr लेकिन दो दिसंबर 1ी रात भयावह हो उठी। बच्चे को कन्भल्सन शुरू हुआ। मित्रों और छात्रों के सहयोगसे हम उसेअस्पताल ले गये, लेकिन, दूसर दिन दोपहर एउक बजे उसकी आंखें पथराने लगीं उस कोटर (छोटे हिरण) की तरह जिसे मैंने चियांकी केपास अरहर के खेत में अपनी राइफ से मारा था। उसके मुंह से वैसे ही आग निकल रहे थे। वह वैसे ही छटपटा रहा था। वह नहीं बचा। इन्सेफेलाइटिस ने उसे मार दिया।ड्ढr अस्पताल के बरामदे में मेर अन्य दो बच्चे (संजय, सीमा) हूपिंग कफ से खांसते-खांसते उलट जा रहे थे। पत्नी परशान थी। मैं पैरशान था। प्रो उमेश चंद्र प्रसाद और उनके पिताजी परशान थे। बड़ी बेटी (सविता) हमारी परशानी देख रो रही थी। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था।ड्ढr सब रो रहे थे। मैउं रो नहीं पा रहा था। कंठ सूख रहा था। पिताजी को कैसे सूचना दूं। उनको मै कौन सा मुंह दिखाऊंगा? मैं पागल हो रहा था। मुझे लगता था, मूच्छिर्उत होकर गिर पड़ूंगा। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हो गया। क्यों हुआ ऐसा? कहां चूक हुई? जिसको जीना चाहिए, वह मर जाता ै।जो मरना चाहता है, उसे मौत नहीं आती। यह कैसे विडंबना है। मैं क्या करुं?ड्ढr मुझे लगता कि मैं जिस सत्य की उपासना करता हूं, उसका कोई ठिकाना नहीं। संभव है, कल सुबह सूरज न निकले। मेरा अविश्वासी मन ‘कागभुसुंडी’ की तरह अग-जग भटक रहा था।कहीं कोई अंत नहीं। चारो ओर अेंरा दिखाई दे रहा था मुझे।ड्ढr कुछ दिनों के बाद मन की इसी बेचैनी में मैंने भारतीय और पाश्चात्य दर्शन की बड़ी-बड़ी पुस्तकें मथ डालीं।माक्र्स और अरविंद को भी छान मारा। कहीं कोई किनारा नहीं मिलता था। इसी मन:स्थिति की एक नागपुरी कविता की येपंक्ितयां द्रष्टव्य है :ड्ढr नहिं मिले र भाी मोके कोनों ठेकान।ड्ढr उड़े अग जग मन, सत हित उन्मन,ड्ढr नहिं सूझे र भाई, तम छानल बितान।ड्ढr आदि बहुत सार लोग मेर घर (क्वार्टर) आते। मुझे समझाते, तसल्ली देते। प्राचार्य दीक्षित ने अपने दु:ख की साझेदारी करते कहा- ऐसी स्ििथत कलेजे में छेद कर देती है। इसे बरदाश्त करने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। अध्यात्म का सहारा लीजिये।ड्ढr रामधन मामा ने समझाया- यह तो बच्चे की मृत्यु का आघात है। अपनी मृत्यु कैसे भयानक होगी, कौन जानता है? इश्विर-शरण केसिवा कोई उपाय नहीं।ड्ढr पामिस्ट शिव शंउकर सिंह ने मेर आलीम चंद्रश्वर प्रसाद कर्ण से कहा- भयानक संताप का समय है। लेकिन केशरीजी इससे उबरंगे। यह घटना उन्हें उच्चतर जीवन-अनुव में ले जायेगी।ड्ढr राम कुमार दादा गढ़वा से लौटते समय मुझे कह गये- कर्मव्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदा चन।ड्ढr पिताजी मां को लेकर डालटनगंज आये। उन्होंने मेर मार पर हाथ रखते हुए कहा-ड्ढr हारिये न हिम्मत, बिसारिये न हरि नाम।ड्ढr लेकिन मुझे एक द्वंद्व के सिवा कुछ न मिला। मुश्किल यह कि मैं खुल कर रो भी नहीं पा रहा था। ड्ढr ं

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