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चुनावी जंग के असल मोर्चे

छह राज्यों में जो चुनाव हो रहे हैं, उनके बारे में धारणा है कि वह अगले साल होने वाले आम चुनावों के महाभारत का पूर्वाभ्यास है। अंग्रेजी में जिसे ‘रेफरेंडम’ कहा जाता है, अर्थात जनमत संग्रह। कांग्रेस हो या भाजपा दोनों का ही तुलनात्मक आकलन यह चुनावी परिणाम हमें जतला देगा। यह एक सीमा तक ही सही है। जिन राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें कुछ बुनियादी बातों में एकता के दर्शन हो रहे हैं तो इतना ही स्पष्ट रूप से उपमहाद्वीपीय आकार वाले इस राष्ट्र राज्य की विविधता भी साफ-साफ झलक रही है। भारतीय जनतंत्र को वंशवादी जनतंत्र का नाम प्रखर पत्रकार गिरिलाल जैन ने दिया था। कुनबापरस्ती और भाई-भतीजावाद हमारी चुनावी राजनीति की पहचान है। अभी हाल मार्गरट अल्वा ने अपने बयान स कांग्रेस पार्टी में जैसी खलबली मचाई उससे यह बात एक बार और शर्मनाक ढंग से जगजाहिर हो गई। धृतराष्ट्र जैसा अंध पुत्र या पुत्री मोह लगभग हर राष्ट्रीय पार्टी में देखन को मिलता है। मुलायम सिंह जी और अखिलेश यादव हो फारूक अब्दुल्ला या उमर करुणानिधिऔर स्तालिन हो या कोई और शाही परिवार, लगभग सभी जगह स्थिति एक जैसी है। जहां कुनबापरस्ती नहीं, वहां जातिवादी प्रतिबद्धता और दुराग्रह या सांप्रदायिक भाईचारा किसी और मुद्दे से महत्वपूर्ण सिद्ध होता रहा है। कहन को हर चुनाव में आम आदमी की जिन्दगी के बुनियादी सरोकारों की बात सबसे महत्वपूर्ण समझी जाती है और हमको यह समझाया जाता है कि सड॥क-बिजली-पानी के बारे में ही सोच-विचार कर मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनता है। मगर दर्दनाक हकीकत यह है कि अखिल भारतीय स्तर पर एकता के दर्शन सिर्फ एक ही मुद्दे पर होते हैं। अपने या परिवार के या समुदाय के संकीर्ण स्वार्थो की सुरक्षा की सबसे बेहतर किस अवसरवादी मतदान से हो सकती है, यही बात अंतत: सबसे महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। भले ही हर बार जिक्र इस बात का किया जाता है कि सड॥क और सतह पर रहने वाला आम आदमी बेहद समझदार होता है और अपने सामान्यज्ञान के आधार पर अपना भला-बुरा वोट डालता है, सरकारें बनाता और बिगाड़ता है। कड़वा सच यह है कि औसत मतदाता इतना समझदार नहीं कि वह डराया भी जा सकता है और ललचाया भी। मत खरीदे-बेचे जा सकते हैं और अधिकांश नादान मतदाता इस सबके बावजूद यह भ्रम पाले रखते हैं कि कहीं न कहीं, कभी न कभी उनके हित अपने आप संतुलित हो जायेंगे और उन्हें अपना न्यायोचित हिस्सा मिल ही जायेगा। विश्लेषक इस आकलन में व्यस्त हैं कि भाजपा जो अपन को दलितों वंचितों का हितैषी घोषित करती है, कैसे खुद जीते बिना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को हरान की क्षमता रखती है और कहां-कहां धूल चटायेगी। इसी तरह पिछड़ों के प्रवक्ता-समर्थक यह जोड़-तोड़ कर रहे हैं कि कैसे राजस्थान में कुंवर नटवर सिंह का बसपा में शामिल होना कांग्रेस के लिए घातक सिद्ध होगा। राजस्थान में चुनावी दंगल के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझी जा रही है कि वसुंधरा राज का मंदिर बना कर देवी के रूप में उन्हें पूजने वाले क्या आज इस भक्ित भाव को वोटों के पूंजी के रूप में भुनाने में सफल नहीं होंगे? क्या गुर्जर-मीणा संघर्ष कड़वाहट मतदान को प्रभावित नहीं करेगी? कुल मिलाकर राजस्थान के चुनावों में कोई जनतांत्रिक मुद्दा उतनी अहमियत नहीं रखता, जितना इस प्रदेश का सामंती संस्कार और जातीय पूर्वाग्रह। कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति मध्यप्रदेश में भी देखन को मिल रही है। कहन को टक्कर सांप्रदायिक ‘भाजपा’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ कांग्रेस के पीछे वास्तव में टक्कर व्यक्ितयों-परिवारों की है और असली मसला जातीय या सांप्रदायिक समीकरणों को सलटान का है। इसी बीच एक और गुत्थी उलझ गई है- हिंदू आतंकवाद वाली। कुछ लोगों का मानना है कि हिंदुत्व का प्रतिपादन करने वाले तत्वों के चेहरे से नकाब हटाकर उन्हें आतंकवादी के रूप में पेश करना प्रगतिशील ताकतों के लिए लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। ठंडे दिमाग से सोचने पर इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि मतदान के वक्त पासा बुरी तरह पलट सकता है। यदि बहुसंख्यकों को ऐसा लगा कि अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करन के लिए ही सरकारी जांच एजेंसियां अभूतपूर्व रूप से सक्रिय और सफल हो रही है तो जो लोग अब तक तटस्थ थे, वह भी अपनी हिन्दू पहचान का प्रदर्शन करन के लिए तत्पर हो सकते हैं। यहीं जम्मू-कश्मीर राज्य के चुनाव का जिक्र किया जा सकता है। अभी हाल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुफ्ती साहब अलग झंडे और अलग लाट साहब की मांग कर रहे हैं। उनके लिए चुनाव आत्मनिर्णय की कसौटी नहीं हो सकती। इन पंक्ितयों का लेखक बड़ी विनम्रता के साथ यह सुझाना चाहता है कि जम्मू-कश्मीर राज्य को देश का अविभाज्य अंग प्रमाणित करन के लिए अलग झंडे की जरूरत नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान के साथ संबंधों के समानीकरण और परस्पर विश्वास बढ़ाने वाले प्रयत्नों की बात करन का अर्थ यह नहीं कि कश्मीरियत को इस तरह महिमामंडित किया जाये कि देश की एकता और अखंडता ही खतरे में पड़ जाए। चुनावों की घोषणा के ऐलान के साथ ही उनके बहिष्कार की घोषणा जम्मू-कश्मीर राज्य में सक्रिय अनेक राजनीतिक तत्वों न कर दी है। इनमें उदार समझे जाने वाले मीरवाईज उमर भी हैं। यदि चुनावों के बहिष्कार के बहान केंद्र सरकार के भयादोहन की परंपरा को एक बार स्वीकार कर लिया गया तो फिर इससे निजात पाना मुश्किल है। अमरनाथ यात्रा के दौरान जो विवाद गरमाया था, उसके चलते इस राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव क्षत-विक्षत हो गया। सैनिक और सहसैनिक बलप्रयोग कुछ स्थितियों में राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता की रक्षा के लिए अनिवार्य है। चुनाव अभियान के दौरान भी किसी भी हालत में कोई ऐसा वक्तव्य नहीं स्वीकार किया जा सकता, जिससे इसका क्षय होता हो। जम्मू-कश्मीर राज्य के चुनाव देश के दूसरे प्रदेशों में होने वाले चुनावों से बिल्कुल फर्क है। और सबसे अहम बात यह समझ लेना है कि सिर्फ श्रीनगर की वादी ही इस सूब का पर्याय नहीं और नहीं सिर्फ अल्पसंख्यक आबादी कश्मीरियत की वारिस होन की दावेदार है। देश की राजधनी दिल्ली भी कश्मीर की तरह अनूठी है। विडंबना यह है कि यहां चुनावी मुद्दा राष्ट्रकुल खेल और उच्चमयवर्गीय श्रेष्ठी वर्ग के इलाकों में जीवनयापन की सुविधा सहुलियतों से बढ॥कर कुछ नहीं। छत्तीसगढ़ में पहिया गाड़ी पर सवार अजित जोगी भले ही खुद को दिलेर साबित कर दें, प्रदेश में नक्सलवादी हिंसा के मूल कारणों के विश्लेषण की शीर्षक इस घड़ी किसी को नहीं। मिजोरम की याद ही किसे है? इतना याद रखें कि देश का कोई भी हिस्सा अपने से दूर और पराया समझन के बाद हम हिन्दुस्तान को बनाये-बचाये नहीं रख सकते। लेखक जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।ं

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