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ब्लॉग वार्ता : आधा गांव के राही का बाकी बचा गांव

आठ जुलाई 1ा दिन था। जब बुधई ने नीम का पेड़ लगाया था। अपने बेटे सुखई के पैदा होन की खुशी में। आजाद भारतड्ढr में यह ज़मीन उसकी हो जाएगी। ज़मींदारी ख़त्म हो जाएगी। तभी तो बुधई ने अपने बेट का नाम सुखई-सुखीराम रखा था। रामबहादुर यादव की ऐसी तकरीरें बुधई के भीतर तक उतरती जा रही थीं। नीम का पेड़। राही मासूम रज़ा की कहानी में लगा यह पेड़ अब भी कई गांवों और चौराहों पर बचा हुआ है। राही मासूम रज़ा नहीं हैं, मगर यह पेड़ अब दिन भर इस इंतजार में बैठा रहता है कि कोई तो छांव में आएगा। कोई नहीं आता। कारों में सवार औरतें आती हैं, उनके ड्राइवर पत्ते तोड॥कर चावल के कनस्तर में ठूंस देते हैं। अब कौन ऐसा कहानीकार बचा है कि जो बचे हुए नीम के पेड़ पर कहानी लिख दे। हमारी जिंदगी को उसके तनों से बांध दें। एक साहब हैं फिरोज़ अहमद। जो अपने ब्लॉग पर राही के पेड़ और गांवों को आबाद करना चाहते हैं। ताकि भूले-भटके राही मासूम रज़ा याद आ जायें तो आप उनकी तमाम रचनाओं की छांव तले सुस्ता सकें। द्धह्लह्लश्चज् rड्डद्धन्द्वड्डह्यooद्वrड्ड5ड्ड.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व ब्लॉग का नाम है राही मासूम रज़ा साहित्य। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मुस्लिम कथाकारों और हिंदी उपन्यासों पर पीएचडी करने वाले फिरोज़ अहमद आगरा विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। जहां पढ़ाते हैं वो अलीगढ़ जिले के इजलास तहसील का एक गांव है ताहरपुर। कोई ताहरपुर से राही मासूम रज़ा के साहित्य को दुनिया भर में उपलब्ध करा सकता है। यह सोच कर ही रोएं खड़े हो जाते हैं। फिरोज़ कहते हैं राही मासूम रज़ा की उर्दू की रचनाओं का भी लिप्यांतर किया जा रहा है। 1में आधा गांव लिखने से पहले तक उर्दू में ही लिखते रहे। आधा गांव के बाद हिंदी में लिखने लगे। राही मासूम रज़ा ने 15-20 उपन्यास शाहिद अख्तर और आफ़ाज़ अख्तर के नाम से लिखे हैं। 300 से अधिक हिंदी फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखने वाले रज़ा के साहित्य को ब्लॉग पर उतारन का काम कोई दीवाना ही कर सकता है। एक बहुत पुराना लेख है राही मासूम रज़ा का। जिसमें वो गैर मुस्लिम उर्दू लेखकों के सम्मेलन की मुखालफत कर रहे हैं। कहते हैं आज़ादी के पहले चाय हिंदू मुसलमान हुआ करती थी, पानी हिॅदू मुसलमान होता था। यूनिवर्सिटियां हिंदू मुसलमान हुआ करती थीं।ड्ढr आज़ादी के बाद लेखक भी हिंदू मुसलमान होने लगे हैं। इसी मासूमियत से रज़ा अपने ज़माने में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को इस्लामी कैरेक्टर देन की अपील का विरोध करते हैं तो हंसी आने लगती है। वो मज़ाक उड़ाते हैं कि किन्हीं जस्टिस बशीर साहब का जो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को इस्लामी करेक्टर देना चाहते हैं। जवाब में रज़ा लिखते हैं कि ऐसी संस्था का करैक्टर इस्लामी कैसे हो सकता है, जिसमें पैसा सिर्फ मुसलमानों का नहीं लगा है। हिंदुओं, ईसाइयों और सिखों का भी लगा है। इनका पैसा बिना सूद समेत लौटाए बिना ये मांग क्यों की गई। यह लेख 15अप्रैल 1े धर्मयुग के अंक में छपा था। इस लेख के आखिर में राही मासूम रज़ा लिखते हैं- साम्प्रदायिकता चाहे जिस रूप में आये, उसका सर हमें कुचल देना चाहिए। चाहे इसके नतीजे में हमें दस चुनाव हारना पड़े। शुक्रिया फिरोज़ साहब हिंदी उर्दू की ऐसी विरासत को एक बार फिर से सामने लान के लिए। कोई रज़ा की हैसियत का साहित्यकार ही कह सकता है कि साहित्य को साहित्य समझ कर पढ़ते समय हम श्रीराम या हज़रत इमाम हुसैन नहीं कह सकते। साहित्य में केवल राम और हुसैन कहे जायेंगे। इनकी कहानी भी कहानी की तरह पढ़ी जायेगी और कहानी की ही कसौटी पर कसी जाएगी। यानी इन कहानियों को हम धर्म की कसौटी पर नहीं कस सकते। मुझे हाल ही दिल्ली विश्वविद्यालय में हुए विवाद की याद आ गई। ए. के. रामानुजन की संकलित रामायण को लेकर कुछ नेता किस्म के लोग हंगामा कर रहे थे। राही मासूम रज़ा होते तो इन्हें डांट कर चुप करा देते। राही मासूम रज़ा की लिखी एक मरसिया है जिसे आपके सामने पेश कर रहा हूं। एक चुटकी नींद की मिलती नहींड्ढr अपने जख़्मों पर छिड॥कन के लिएड्ढr हाय, हम किस शहर में मारे गए फिरोज़ अहमद कहते हैं ताहरपुर गाँव के कॉलेज में पढ॥कर क्या पहचान मिलेगी। कब तक सम्मेलनों में जाकर पर्चे पढ़ते रहेंगे। क्यों न ऐसा काम करें जिससे खुद को संतोष मिले और दुनिया को मेरे काम के ज़रिये पता चले कि राही मासूम रज़ा नहीं हैं तो क्या हुआ। उनका लिखा बहुत कुछ है रास्ता दिखान के लिए। लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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