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सहमति के तर्क

हते हैं कि जितनी शक्कर डालो, उतना मीठा होगा। आजकल लोग कहने लगे हैं कि जितनी शक्कर डालो, उतना डायबिटीा होगी। लेकिन उम्मीद है कि आज नहीं तो कल अखबारों में ऐसी कोई खबर जरूरी छपेगी कि अमेरिकी अमुक मेडिकल रिसर्च इंस्टिटय़ूट के नए शोध पत्र में बताया गया है कि ज्यादा चीनी खाने से डायबिटीा में कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि फायदा ही होता है। फिर तमाम पत्र पत्रिकाओं में लेख छपेंगे- डायबिटीा का मित्र, दुश्मन नहीं दोस्त-चीनी, चीनी खाओ डायबिटीा भगाओ। ऐसा दिन भी आएगा कि शोधपत्रों के हवाले से खबरं छपेंगी कि रो चार समोसे खाने से मोटापा कम होता है। तब हो सकता है कि सचमुच समोसा दस हाार रुपए में बिके। बहरहाल, बात शक्कर डालने से मीठा होने की हो रही थी। इसे यूं भी कह सकते हैं कि अगर आपकी बात के समर्थन में ज्यादा तर्क हो तो बात ज्यादा वजनदार हो जाती है। जसे आजकल संघ परिवार वाले उन लोगों के समर्थन में जुट गए हैं जो मालेगांव, सूरत वगैरा के बम विस्फोटों के सिलसिले में पकड़े गए हैं। सबसे शुरुआत में उनका तर्क यह था कि आतंकवादी को किसी धर्म से नहीं जोड़ना चाहिए। कानून को अपना काम करने देना चाहिए। फिर धीर से एक तर्क आया कि देखिए इतने विस्फोट मुस्लिम आतंकवादियों ने किए हैं, तो प्रतिक्रिया होना तो स्वाभाविक है। फिर तीसरा तर्क आया कि दरअसल पकड़े गए लोग निर्दोष हैं, उनके खिलाफ षड्यंत्र हो रहा है। ये सार तर्क परस्पर विरोधी हैं और वैसे ही हैं जसे कई मुस्लिम संगठन देते हैं और संघ परिवार वाले उनका विरोध करते हैं। लेकिन वे ही सार तर्क, बल्कि ज्यादा जोरशोर से संघ परिवार वाले दे रहे हैं और उनके समर्थक स्वीकार में गर्दन हिला रहे हैं। महत्वपूर्ण तर्क नहीं है, महत्वपूर्ण सहमत होना है और जिन्हें सहमत होना है, वे बिना सोचे समझे सहमत ही होंगे। मेर हाथ कहीं से ‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका का अक्तूबर 1ा अंक पड़ गया। उसमें एक वरिष्ठ स्वयंसेवक ने एक लंबा लेख लिखा है। उस लेख में एक जगह प्रसंग है कि गुरु गोलवलकर के साथ यह स्वयंसेवक एक संघ कार्यकर्ता के घर गया। ...इस परिवार में एक आलमारी में शोभा हेतु प्रदर्शनार्थ कलापूर्ण वस्तुएं रखी थीं...इस घर में दर्शनीय वस्तु थी ‘ताजमहल’, यानी एक मुसलमान की कब्र। हमार साथ के बंधुओं को इस दृश्य से कैसा लगा होगा! यह सोचने का विषय है। पीएन ओक पहले एक किताब बेचते थे- ‘क्या ताजमहल हिंदू मंदिर था?’ संघ के लोग इससे भी सहमत थे। यानी ताजमहल से घृणा करनी है, तर्क कुछ भी हो, क्या फर्क पड़ता है।

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