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छत्तीसगढ़:धान के कटोर में चावल की सियासत

छत्तीसगढ़ में अगली सरकार किसी की भी बने, लकिन राज्य में इन चुनावों को चावल के लिए होने वाली सियासत के लिए याद किया जाएगा। चुनावी साल के शुरुआत में रमन सिंह ने गरीबों को चावल देन की जो स्कीम शुरू की, वो ऊपरी तौर पर देखने में तो एक वेलफेयर स्टेट की आदर्श योजना दिखती है, लकिन उसके पीछे की राजनीति बहुत ही दिलचस्प है। असल में रमन सिंह भले ही अजीत जोगी के मुकाबले साफ सुथरी छवि वाला चेहरा दिखते हों, लेकिन उनकी सरपरस्ती में सूब की सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे हैं। खुद रमन सिंह ने ऊर्जा और खनन के जो महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रखे उसमें धांधली और दलाली के और कई बार लगाए गए। लकिन इसके बावजूद रमन सिंह की 3 रुपए किलो चावल की योजना के कई पहलू हैं जो उनके लिए फायदा बटोर सकते हैं और जिसकी कामयाबी की संभावना से डर कर कांग्रेस ने 2 रुपए किलो चावल का वादा अपने घोषणापत्र में शामिल किया। रमन सिंह सरकार के दावे ही बताते हैं कि मुफ्त चावल की यह योजना गरीबों का भला करन की बजाय उनकी पार्टी का कितना भला कर रही है। छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार दावा करती है कि वो 36 लाख लोगों तक इस योजना का फायदा पहुंचा रही है। अगर वाकई ऐसा है तो प्रति परिवार पांच लोगों के हिसाब से एक करोड़ से ज्यादा लोगों तक इस योजना का फायदा मिल रहा है। यानी छत्तीसगढ़ के 80 फीसदी से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे है। इसके बावजूद आप गांवों में जाएं तो आपको कई लोग ऐसे मिलेंगे जो कहते हैं कि उनका राशनकार्ड नहीं बना है। साफ है कि चुनावी फायद के लिए गरीबों के नाम पर धड़ल्ले से राशनकार्ड बना लिए गए हैं। या तो सस्ते चावल का फायदा बहुत बड़ी संख्या में उन लोगों को हो रहा है जो इसके हकदार नहीं हैं या फिर गरीबों के नाम पर मिलने वाला राशन खुले बाजार में भेजा जा रहा है। एक गांव में लोगों ने हमें बताया कि रोज़गार गांरटी योजना के बाद जब लोगों के पास पैसा है तो इस योजना को चलाने वालों ने गरीबों को ये ऑफर भी कई जगह दिया है कि या तो आप 3 रुपए किलो के हिसाब से 35 किलो मुकर्रर चावल ले जाएं या फिर 20 किलो चावल मुफ्त में लेकर बाकी हमारे पास छोड़ दें। छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री दावा करते हैं कि उनके राज्य में सबसे अच्छा पीडीएस सिस्टम है लकिन रायपुर के बाहर ही एक गांव में मुझे राशन की दुकान पर ज़बर्दस्त मारामारी दिखी। पूछने पर पता चला कि पास के गांवों में सस्ते चावल की वजह से घोटाला हो गया। राशन की वो दुकानें सील करनी पड़ी और सरकार ने बंद हुई दुकानों के ग्राहकों को वहां भेज दिया है। हैरत की बात ये है कि विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस योजना का विरोध करने या पोल खोलन की बजाय खुद भी लोगों को मौजूदा सरकार से भी सस्ता यानी 2 रुपए किलो चावल देन की घोषणा कर दी है। क्योंकि उसे भी ये शॉर्टकट लगता हैं। ऐसा लगता है कि दोनों ही पार्टियां भ्रष्टाचार की बहस ही खत्म कर देना चाहती है। मंदी के दौर में जब सराकारें बड़ी कंपनियों और निजी बैंकों को बचान के लिए पैसा खर्च करन को तैयार हैं तो महंगाई के बोझ से दबे लोगों के लिए ऐसी कल्याणकारी योजना पर ऐतराज नहीं हो सकता। लेकिन यह योजना गरीब के अलावा ही कई लोगों को फायदा देती दिखाई पड़ रही है। दूसरी बात ये कि जब से सस्ते चावल की योजना राज्य में शुरू की गई तब से वहीं शराब की बिक्री बढ़ गई है। ऐसी कल्याणकारी योजना चलाने वाली सरकार को ये भी पता करना चाहिए कि उसके राज्य में अचानक मज़दूरों का मिलना क्यों कम हो रहा है और ये पैसा शराब में तो नहीॅ जा रहा। आखिर ऐसी कल्याणकारी योजना का कोई मतलब नहीॅ जो ज॥रूरतमंद को फायदा न पहुंचा पाए और राज्य की उत्पादकता को नुकसान करे। कभी धान का कटोरा कहे जाना वाला छत्तीसगढ़ अब किसानों की बदहाली की कहानी लिख रहा है। धान का कटोरा खाली हो रहा है और धान की पैदावार करने वाले किसान पानी के लिए तरस रहे हैं। लकिन दोनों मुख्य पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस समस्या को हल करन का रोडमैप बनाने के बजाय मतदाताओं को चावल का सब्ज़बाग दिखाकर फौरी फायदा लेना चाहते हैं। लेखक एनडीटीवी इंडिया में वरिष्ठ विशेष संवाददाता हैं।

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