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चुनाव सभा की महिमा

लोकतंत्र में सभाओं का खास महत्व है। ग्रामसभा से लोकसभा तक। राज्यसभा और विधानसभाओं की अपनी महत्ताएं हैं। हमारे देवता तक इनकी उपयोगिता से वाकिफ रहे। राजा इंद्र पर जब-जब संकट आता था, वे इंद्र सभा का विषेष सत्र बुला लेते। अप्सराएं नाचतीं। देवता प्रसन्न होते। इंद्र का आसन भी विचित्र था। वह बैठे रहते। यह डगमगाता रहता। सभा चलती रहती। राजा का आसन डगमगाए, इसके लिए एक सभा का होना निहायत जरूरी है। यह पौराणिक परंपरा है। आज भी कायम है। डेमोक्रेसी में जब कभी किसी राजा की कुर्सी डगमगाती है, वह बहुमत का बल प्रदर्शन करता है, या फिर सभा को भंग कर देता है। कभी-कभी इन सभाओं को अपनी निश्चित आयु पूरा करके स्वयंमेव भी समाप्त होना होता है। तब तमाम अनुष्ठानों के बाद जो सभाएं आयोजित की जाती हैं, उनको चुनाव सभा के उत्तम नाम से बुलाया जाता है। इन दिनों इन्हीं चुनाव सभाओं का जोर है। इनकी विशिष्टता यह होती है कि इनमें भीड़ अपने आप जुटती है। वही राजनीतिक दल, जब रैली-प्रदर्शन वगैरह कर रहे होते हैं, तब पब्लिक को किराए पर लाना पड़ता है। इनमें भीड़ के स्वत: जुटन के अपने कारण हैं। जनता क्षेत्र के उम्मीदवार की शक्ल देखना चाहती है। तमाम तरक्िकयों के बावजूद अभी भी देश के जागरूक मतदाता, दल या अक्ल देखकर मतदान करन की जगह शक्ल देख के बटन दबाने में यकीन करते हैं। वैसे जिसका अस्तित्व होता है आप उसी को तो देख सकते हैं। राजनेता चतुर हैं। वे इस कमजोरी को बखूबी समझते हैं। वे टीवी और फिल्म के कलाकारों को बुला लाते हैं। इनकी प्यारी सूरतें देखो और वोट हमें दो। जनता पूछती है- ‘हे प्रत्याशी महोदय, क्या आपका फेस इस लायक नहीं, जिसके दम पर आप वोट पा सको। इन कलाकारों को काहे नचाते हो महाराज! ये कितने भी बड़े कलाकार हों, आप से अच्छी ऐक्िटंग इन्हें थोड़े आती है।’ वोटर्स का एक तबका तो सिर्फ इस मतलब से ही आता है कि एक दफा देख लो, वरना पांच साल बाद दीदार नसीब होंगे। चुनाव सभाएं बच्चों के लिए मनोरंजन, यूथ्स के लिए टाइमपास और बूढ़ों के लिए चर्चा का मसाला होती हैं। ये लोकल भाषणियों को माइक तक पहुंचान की सीढ़ी हैं। चुनाव सभाएं मुंह की खुजली मिटाती हैं। भाषा को नया संस्कार देती हैं। स्थानीय तुकबंद कवियों और लोकगायकों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सशक्त संसाधन हैं। इलाके के बुजुर्ग की खातिर अध्यक्षता तथा ठेकेदार के लिए कुर्सी, माइक, रोशनी और बांस-बल्ली हैं। पार्टी वर्कर्स के लिए जिंदाबाद का नारा और मतदाताओं के बहरा होन का सुअवसर होती हैं।

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