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आर्थिक संकट से मुक्ित की राह

संसद सत्र स्थगित है। विधानसभाओं के चुनाव में नेतागण व्यस्त हैं। इस बीच आर्थिक स्थिति में अचानक और अप्रत्याशित ढंग से बिगाड़ आया है। वैश्विक आर्थिक संकट के शुरुआती चरण में नीति निर्धारकों ने कहा था कि इसका भारत पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। इस बयान का आंशिक कारण भरोसा कायम करना रहा। खासकर ऐसे मौके पर यह जरूरी था, जब बैंक और वित्तीय संस्थानों में मुर्दनी छाई है और रिडेम्शन के दबाव ने औसत भारतीयों के मन में आशंका पैदा कर दी है कि सावधि जमा और म्युचुअल फंड्स सुरक्षित हैं या नहीं। तरलता पैदा करने के लिए सरकार ने कैश रिार्व रशिओ (सीआरआर) और स्टैचुअरी लिक्िवडिटी रशिओ (एसएलआर) में आवश्यक कटौतियों के कदम शीघ्र उठाए। सीआरआर और एसएलआर में कटौतियों से बैंकिंग प्रणाली में खासी तरलता पैदा हुई है। रिवर्स रपो रट (आरआरआर) में कटौती से ब्याज दरों पर दबाव कम होना शुरू हो गया है। फिर भी, वित्तीय दुनिया के पार असली दुनिया में स्थिति काफी खराब है। इन बातों पर जरा गौर करं : पहली, खासकर चमड़ा और टेक्सटाइल्स, जेम व ज्वेलरी, हस्तशिल्प, कालीन के निर्यात धीमा होने से ये क्षेत्र आहत हैं। उत्पादन में 50 प्रतिशत की कमी हुई है और अनुमान है कि सिर्फ इन क्षेत्रों में नौकरियां गंवाने वाले लोगों की तादाद 20 लाख से ज्यादा होगी। बाद में भी रोगार और कम हो सकते हैं। इसके अलावा, नए रोगार सृजन की गुंजाइश नगण्य है। दूसरी, उच्च मोरगैज और घटती मांग ने ऑटोमोबाइल (इसी प्रकार स्टील, पेंट आदि), उपभोक्ता व घर में काम आने वाले उत्पादों की बिक्री घटी है। परिवहन सेक्टर कठिनाई में है क्योंकि ढोने के लिए वस्तुएं और साजसामान कम मिल रहा है। रियल एस्टेट में जो गुब्बारा फूलकर बड़ा हो गया था, वह फट चुका है और उसने विनिर्माण सेक्टर को गहर संकट में डाल दिया है। इन सभी सेक्टरों में भारी बेरोगारी पैदा हो रही है और लेऑफ का सामना करना पड़ रहा है। तीसरी, वित्तीय सेक्टर व र्का की उपलब्धता की स्थिति ठीक नहीं है और जोखिम ज्यादा मानी जा रही है, इसलिए र्का-ाोखिम की लागत भी बहुत ज्यादा है। बैंकों को अधिक सक्रिय रहकर कम दरों पर र्का देने होंगे। अनेक बड़ी निवेश परियोजनाएं संकट में हैं और नए निवेश आ नहीं रहे हैं। इसका रोगार पर गंभीर असर पड़ना भी लाजिमी है। चौथी, विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि विकास दर वृद्धि 7.5 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रहेगी। निराशावादी विश्लेषक तो इसे 6-6.5 प्रतिशत तक नीचे बता रहे हैं। साफ है कि पिछले तीन साल की तुलना में यह तीन प्रतिशत कम है। सबसे बुरी बात यह है कि वर्ष 200में विकास दर और भी कम रहेगी। साफ है कि प्रति व्यक्ित आय बहुत कम रहेगी और घरलू मांग में वृद्धि सिमट जाएगी। बाहरी और अंदरूनी मांग दोनों ही भावी निवेश तथा रोगार सृजन पर भारी दबाव बनाएंगे। यह संकट 1े आर्थिक संकट से अधिक गहरा और लंबा हो सकता है। वित्त मंत्रालय में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए मैंने 1े संकट से निबटने का प्रयास किया था, जो काफी गंभीर संकट था, पर कम ढलान वाला था। यह मुख्य रूप से घरलू आर्थिक कुप्रबंधन और अर्थव्यवस्था के अत्यधिक विनियमन (रगुलेशन) का नतीजा था। इसलिए, सुधार आसान थे और दो साल से भी कम समय में हम उससे उबर गए। उसके बाद हमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मौजूदा संकट घरलू नहीं, बल्कि वैश्विक है। जसे-ौसे इस संकट की परतें उघड़ती जा रही हैं, वैसे-वैसे यह गहराता जा रहा है। इसका हल भारत के हाथ में नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि कई अन्य देशों की तुलना में कम विनियमन होने के बावजूद हम वैश्विक रूप से अधिक अंतर-निर्भर होते गए और संभव है कि आंकड़े इसकी सही तस्वीर न दे पाएं। जीडीपी के 16 प्रतिशत हिस्से के बराबर निर्यात हो सकता है, लेकिन इसका व्यापक असर पड़ता है। अमेरिका में प्रमुख बैंकों और वित्तीय संस्थानों की भीषण तबाही के दुष्परिणाम अनेक कॉल सेंटर्स के बंद होने और सॉफ्टवेयर की मांग तथा सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी गतिविधियों में कमी आने के रूप में सामने आए हैं। दुर्भाग्य यह है कि मौजूदा नीति निर्धारक अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में हैं। नई सरकार को विरासत में अर्थव्यवस्था की बुरी हालत मिलेगी और अगर उसका समाधान नहीं किया गया तो सामाजिक तनाव उपजेगा। इसलिए, लघुकालिक दृष्टि से भारत क्या कर? 1.उसे अपनी स्वयं की अंदरूनी ताकत पर भरोसा करना होगा। वह सभी बड़े सार्वजनिक निवेश पूर कर और उनके लिए आवंटित धन का उपयोग करना चाहिए। मतलब यह है कि सड़क, बिजली, बंदरगाह, गैर-मैट्रो हवाई अड्डों में निवेश पर अमल में तेजी लानी होगी। नौकरशाही की अडंगेबाजी या राजनीतिक स्वार्थ के चलते जिन परियोजनाओं में देरी हुई है, उन्हें शीघ्र पूरा करने पर बल देना होगा। 2.सामाजिक सेक्टर, खासकर स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए आवंटित धनराशि का शीघ्र उपयोग किया जाए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नौकरशाही ने शिक्षा सेक्टर में सुधार की कई उपयोगी सिफारिशें ठंडे बस्ते में डाल रखी हैं। 3. अर्थव्यवस्था में अधिक धनराशि के निवेश के लिए आप्रवासी भारतीयों (एनआरआई) को राजी करने का प्रत्येक संभव प्रयास किया जाए। यह ऐसा समय है, जब वे अपनी पूंजी और दौलत का निवेश कर भारत के विकास को तेज गति दे सकते सकते हैं। 4. ब्याज दरों में कमी लाना जरूरी है। इसलिए भी कि मुद्रास्फीति नीचे आ रही है। बैंक उदार रवैया अपनाकर उस लागत पर र्का मुहैया कराएं, जो उनकी पहुंच में हो। 5. अंतरराष्ट्रीय गारंटी के जरिए बाहरी पूंजी के प्रवाह के लिए नई खिड़कियां खोलने का प्रयास किया जाना चाहिए, जिसके तहत पेट्रो-डालर तक पहुंच बनाई जाए। विश्व बैंक के लिए यह एक अच्छा अवसर है कि वह अपने सामान्य कार्यक्रमों के पार जाकर विशेषकर हमारी ढांचागत सुविधाओं के लिए स्वीकार्य शर्तो पर बड़े पैमाने पर धनराशि उपलब्ध कराए। 6. हमें मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों के जरिए हमार निर्यातकों की मदद करनी चाहिए ताकि वे अपने खोए बाजार पुन: पा सकें। 7. रोगार में गिरावट रोकने और अर्थव्यवस्था में रोगार सृजन के लिए एक नई रणनीति बनानी होगी। जिन परियोजनाओं में रोगार की उच्च संभावना है, उन्हें प्राथमिकता देकर अमल किया जाना चाहिए। एक गैर-दलीय नजरिया और साझा सहमति से राजनीतिक कदम उठाने की जरूरत है। सभी राजनीतिक दलों को ऐसे कदम उठाने के लिए एकाुट होना चाहिए, जो इस संकट से निपटने में सक्षम हों, अन्यथा हमारी जनता को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। यदि सरकार ने आश्वस्तकारी शब्दों से आगे बढ़कर मुस्तैदी से कार्य नहीं किया तो हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं।ं

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