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तीसरे दौर की गर्मी

मतदान के तीसरे दौर में निराशाजनक प्रतिशत के लिए और कुछ हो या न हो, दोष देने को मौसम तो है ही। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के मतदान के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यहां भी मतदान का उत्साह-स्तर, उत्तर भारत के अन्य इलाकों जसा ही नीचा रहा है। बावजूद इसके कि हमारे प्रचार माध्यम पप्पू के वोट डालने की अपीलों से भरे हुए हैं। मोमबत्ती जलाने वाले महानगर मुंबई से मिले मतदान के आंकड़े भी ज्यादा उत्साहानक नहीं है। इसके विपरीत सिक्िकम एक अच्छा उदारहण है और पश्चिम बंगाल या कर्नाटक के लोगों ने वोट डालने में उत्तर भारतीयों जसा आलस नहीं दिखाया। वैसे वोट न डालने की वजह के लिए आलस एक काफी हल्का शब्द है। यूं पूरी तरह मतदाताओं को दोष देना भी शायद ठीक नहीं होगा। यह पहले से ही कहा जा रहा है कि इस बार वे मुद्दे ही नहीं हैं, जो मतदाता को उद्वेलित करें। चुनाव के वक्त मतदाता से सामने जो मुद्दे, मसले, सपने और वायदे परोसे जाते हैं, आखिरकर वे ही तो उसे मतदान केंद्र की तरफ खींच कर ले जाते हैं। जब वोटर को लगने लगता है कि उसे किसी बदलाव को लाना है या किसी बदलाव को रोकना है तो ही अक्सर भारी संख्या में मतदान होता है। इसके विपरीत अगर वोटर वोट डालने नहीं पंहुचता है तो इसका अर्थ सिर्फ इतना ही है कि उसे किसी अच्छे बदलाव के आगाज का ज्यादा भरोसा नहीं है। इसलिए कम मतदान के पीछे का असली खलनायक शायद राजनीति के तापमान का एक हद से कम होना ही है। शुरूआत में इस बार ज्यादा मतदान होने की उम्मीद थी। एक वजह यह थी कि इस बार मतदाता सूचियों में भारी संख्या में ऐसे मतदाता जुड़ गए थे, जिन्हें पहली बार वोट डालने का अवसर मिलना था। उम्मीद थी कि वे बड़ी तादाद में मतदान केंद्रों में उमड़ेंगे। उनके उत्साह में कोई कमी न रह जाए, इसके लिए भारी भरकम विज्ञापन अभियान भी चलाए गए थे। लेकिन राजनैतिक दलों की तरह ही ये विज्ञापन अभियान भी उन्हें वोट डालने की प्रेरणा देने में नाकाम रहे। या यूं कहें कि ये विज्ञापन चुनाव को लेकर युवा वर्ग में वह उत्साह जगाने में नाकाम रहे, जिसका अभाव पूर समाज में ही दिख रहा है। सकारात्मक बदलाव की संभावना और बेहतरी की उम्मीदें ही लोगों को बड़ी तादाद में मतदान केंद्र की ओर ले जाती हैं, घर से निकल कर वोट डालने का कोरा महिमा मंडन नहीं।

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