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हारे प्रत्याशी की अर्जी पर न हो कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि चुनाव में भ्रष्ट व्यवहार के आरोप सिद्ध करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली की मानिंद सबूत ठोस और पक्के होने चाहिए। संभावनाओं और अनुमान के आधार पर लगाए गए आरोपों का काई अर्थ नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कम वोटों से हारने वाला उम्मीदवार हार पचा नहीं पाता इसलिए उसकी कोशिश रहती है कि वह जीते हुए उम्मीदवार के खिलाफ हर संभव सबूत जुूटाए। लेकिन कोर्ट को यह समझना चाहिए और ऐसी याचिकाओं पर जीते हुए उम्मीदवार को बेदखल नहीं करना चाहिए। यह व्यवस्था देते हुए जस्टिस दलवीर भंडारी और हराीत सिंह बेदी की खंडपीठ ने वोटों से हार अकाली दल उम्मीदवार बलदेव सिंह मान की चुनाव याचिका खारिा कर दी। पंजाब की दीरबा विधानसभा सीट पर यह चुनाव फरवरी 2002 में हुए थे। कोर्ट ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व कानून, 1ी धारा 123 (7) के तहत लगाए भ्रष्ट व्यवहार के आरोप बहुत प्रत्यक्ष और सटीक होने चाहिए। क्योंकि यह स्थापित कानून है कि ऐसे आरोपों के सबूत आपराधिक मामलों में दिए गए सबूतों की तरह पूरी तरह ठोस और पक्के होने चाहिए। इस मामले यह सिद्ध नहीं हो पाया कि जीते हुए उम्मीदवार की मदद करने वाले दोनों अधिकारी बीएस शेरगिल (पंचाचत उपनिदेशक) और गुरबचन सिंह बच्छी (बिजली बोर्ड में प्रशासनिक सदस्य) अधिकारी गजेटेड अधिकारी थे। जबकि शेरगिल सरकारी कर्मचारी जरूर थे लेकिन गजेटेड अधिकारी नहीं थे। वहीं बच्छी गजेटेड अधिकारी थे लेकिन सरकारी कर्मचारी नहीं थे क्योंकि बिजली बोर्ड स्वायत्त निकाय है जिस पर सरकार कोई नियंत्रण नहीं है। कोर्ट ने कहा कि धारा 123 (7) के तहत भ्रष्ट व्यवहार सिद्ध करने के लिए मदद देने वाला कर्मचारी सरकारी और गजेटेड अधिकारी होना चाहिए लेकिन इस केस में ऐसा नहीं है।

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  • Web Title: हारे प्रत्याशी की अर्जी पर न हो कार्रवाई