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हम कितने लाचार हैं

मनुष्य क्या सचमुच सामथ्र्यवान है? क्या वह अपने घर में अपनी इच्छा से सो या जाग सकता है? जसे ही सोने की तैयारी करेंगे, तेज चलते लाउडस्पीकर या कार स्टीरियो आपको सोना टालने को विवश कर देते हैं। कारण कुछ भी हो, किसी के घर शादी या जन्मदिन, या धार्मिक कार्यक्रम, सब बिना ऊंची आवाज और तेज संगीत के फीके लगते हैं। पुलिस वाले भी लोगों की खासकर धार्मिक उत्सव मनाने की आजादी में वे बाधक नहीं बन सकते। लाचार हैं। शहरी सभ्य, शिक्षित लोग सुबह बेतहाशा भागते दिखते हैं। सबको अपने दफ्तर, स्कूल, कॉलेज जाने की जल्दी होती है। पर सड़क टूटी है या बत्ती खराब है तो लंबी कतारें रेंगती दिखाई देंगी। सब बेबस हैं। अगर किस्मत से सड़क साफ मिल जाए और तेजी से जाने का मौका मिले तो सबकी रफ्तार तो एक सी नहीं होती। दुर्भाग्य से अगर एक कार कुछ खराबी के कारण रुक जाती है और पीछेवाला अपनी तेज रफ्तार की वजह से रुक ना पा कर भिड़ जाता है तो बजाय सॉरी कहने के जिससे टकराता है उसी को कार से बाहर खींचकर उसकी पिटाई शुरू कर देता है। इक्का-दुक्का तमाशबीन रुकते हैं, पर सिर्फ देखने के लिए, बीच-बचाव के लिए नहीं। बाकी कारं फर्राटे से भागती जाती हैं किसी के पास दूसर के झगड़े में पड़ने का समय नहीं है, वैसे भी कौन अपनी जान खतर में डाले। रोाना ऐसी सैकड़ों खबरं मिलती रहती हैं। जब हम देखते या पढ़ते हैं, तो मन कभी गुस्से और कभी लाचारी से परशान हो जाता है, पर अगले ही पल अपने कामों में लग जाते हैं। क्योंकि हम इस सबके आदी हो चुके हैं। इंसान स्थितियों से समझौता कर लेता है। पर यह बेबस सहन शक्ित देश के विकास में बाधक है। जरूरत है कि ऐसी स्थितियों और व्यक्ितयों का मिलकर दृढ़ता से विरोध करं। इससे उम्मीद तो रहेगी कि शायद कभी इन्हें हरा पाएं।

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