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जनता के मुद्दे हाशिये पर

ईश्वरीय प्रकृति से खिलवाड़ समाज में समलैंगिक संबंधों को गाहे-बगाहे जायज ठहराने के प्रयास एक लंबे अरसे से हो रहे हैं। कई देशों में गे-मैरिाों को मान्यता भी दे दी गई है। यह सब ईश्वर की बनाई प्रकृति से खिलवाड़ नहीं तो और क्या है? क्या दो पुरुष आपस में बिना किसी महिला की सहायता के वंश वृद्धि कर सकते हैं? या फिर क्या महिलाएं बिना पुरुष की मदद लिए ऐसा करने में सक्षम हैं? जवाब है, नहीं। सृष्टि का विकास इन संबंधों के जरिये नहीं हो सकता। तो फिर आखिर ऐसे संबंधों की वकालत क्यों की जा रही है? इस तरह के संबंधों का अंत सिवाय दु:ख और ग्लानि के कुछ भी नहीं है। रतना शर्मा, फेा 2, मोहाली छात्र राजनीति का बिगड़ता रूप आजकल कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कम और राजनीति ज्यादा हो रही है। कुछ छात्र तो कॉलेजों में दाखिला ही राजनीति करने के लिए लेते हैं। ये ही कॉलेज का माहौल खराब करते हैं। चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी इसका सबूत है। यहां कुछ छात्र केवल राजनीति करने के लिए पूर कैंपस का माहौल खराब कर रहे हैं। छात्र गुटों में आए दिन झगड़े हो रहे हैं। इन छात्रों को पता है कि अगर कैंपस में उनकी राजनीति थोड़ी सी चमकी तो किसी भी राजनीतिक दल में वे आसानी से एंट्री पा सकेंगे। यूनिवर्सिटी प्रशासन भी ऐसे छात्रों पर लगाम नहीं लगा पा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि ये छात्र आमतौर पर प्रभावशाली परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। छात्र राजनीति के बिगड़ते स्वरूप से नुकसान उन छात्रों का हो रहा है, जो यूनिवर्सिटी में कुछ बनने का सपना लेकर आते हैं। अब समय आ गया है कि हमारी सरकार कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में होने वाली राजनीति को बंद करने के लिए सख्त कदम उठाए। अनुभव सिंह, सेक्टर 30 चंडीगढ़ जंगल जंगल ही रहे गजाणा में मनियार तोक में हर पेड़ काटकर प्लाट बनाने की मंशा को पूरा न करने दिया जाए। भू-माफिया और उनसे मिलीभगत करने वालों की पूर्व प्लानिंग होती है कि अब तो पेड़ कट गये, ज्यादा से ज्यादा सजा होगी या जुर्माना, पर प्लाट तो बन जायेंगे। उनके मुताबिक आलीशान सीमेन्ट का जंगल खड़ा हो जायेगा। मेरी राय लें तो जंगल के रक्षक भक्षक बने हैं उनको कठोर आदेश के साथ नौकरी से निकाल दिया जाए और जहां पेड़ काटे गये हैं, वहां फिर वृक्षारोपण किया जाये और उसी किस्म के पेड़ लगाये जाएं ताकि जंगल, जंगल ही रहे। इस प्रकार का कानून बनाया जाए तो जंगलों के घटते प्रतिशत में कमी होगी। जिसे हम विकास कहते हैं, वहां विनाश तो होता ही है। इस विनाश का प्रतिशत कम किया जाय। श्रीप्रसाद गैरोला, देहरादून

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