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आर्थिक सुधारों की समीक्षा जरूरी : चिदंबरम

अभी तक भारत भले ही दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की कवायद करता रहा हो लेकिन वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में आर्थिक सुधारों की इस प्रक्रिया की समीक्षा करने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। यहां आर्थिक संपादकों के सम्मेलन को संबोधित करते हुये खुद वित्त मंत्री पी.चिदंबरम ने दो टूक शब्दों में कहा कि आर्थिक सुधारों की समीक्षा करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें देश में ऐसी वित्तीय प्रणाली स्थापित करने की जरूरत है जो सक्षम होने के साथ ही किसी भी चुनौती का हल तुरंत निकाल सकती हो। उनके मुताबिक न तो हम बेलगाम पूंजीवादी अर्थव्यवस्था चाहते हैं और न ही साम्यवादी अर्थव्यवस्था। हम बेहतर ढंग से नियमन आधारित वित्तीय प्रणाली स्थापित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि विभिन्न उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए कर रियायतें देने पर विचार किया जा सकता है, बशर्ते कि ये रियायतें जरूरत आधारित होनी चाहिये। ढांचागत क्षेत्र में अगले पांच साल के दौरान 500 अरब डॉलर के निवेश की योजना बनाई गई है। इसके लिए घरलू स्तर पर धन जुटाने के साथ ही विश्व बैंक से सालाना हासिल हो रही तीन अरब डॉलर की वित्तीय सहायता को दो गुना बढ़ाकर छह अरब डॉलर करने पर बातचीत की जा रही है। उन्होंने कहा कि जहां तक विभिन्न उद्योग क्षेत्रों में विदेशी निवेश सीमा को बढ़ाने की बात है, उस पर उद्योग मंत्रालय की ओर से एक प्रस्ताव मंत्रियों के समूह (ाीओएम) के पास भेजा गया है। इस पर अंतिम फैसला होना बाकी है। आयकर संग्रह के लक्ष्य के बार में बोलते हुये उन्होंने कहा कि इसे हार हाल में पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि देश आयकर व्यवस्था के ढांचे को तब्दील करने का कोड बन चुका है। अब इस पर विधेयक लाने की तैयारी की जाएगी। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि चालू वित्त वर्ष के दौरानराजकोषीय घाटा और भुगतान संतुलन पर दबाव तय है।

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