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हर पल बंदूक के साए में रहे बंधक

‘मैं ऐसी यातना की इच्छा अपने दुश्मनों के लिए भी नहीं कर सकता। हमें चौबीसों घंटे बंदूक की नाल पर रखा गया। दस्युओं की क्षाजत के बगैर हम हिल भी नहीं सकते थे।’ यह दास्तां सुनाई एलिस्टेयर फर्नाडीज ने, जो चालक दल के उन 18 भारतीयों में शामिल थे जिन्हें दो माह से अधिक समय तक सोमालियाई समुद्री लुटेरों ने बंधक बनाए रखा। जापानी कंपनी का मर्चेट शिप ‘एमटी स्टोल्ट वलर’ 15 सितंबर को अदन की खाड़ी से अपहृत कर लिया गया था। फिरौती की भारी-भरकम रकम चुकाने के बाद ही सभी 22 क्रू-मेंबरों की रिहाई संभव हो सकी। रिहा 18 भारतीयों में से पांच सोमवार को मस्कट से फ्लाइट पकड़कर वतन लौटे। ये हैं-गोवा क एस्टेडोर फर्नाडीस और एलिस्टेयर फर्नाडीस, मुंबई क ओमप्रकाश शुक्ला और संतोष पाटिल तथा रत्नागिरी क नवीद बराडकर। जहाज के कप्तान पी. के. गोयल समेत बाकी लोग मंगलवार को लौटेंगे। मुंबई पहुंचे कर्मचारियों का हवाई अड्डे पर गीली आंखें लिए उनके परिानों और शुभचिंतकों ने स्वागत किया। बंधकों ने आपबीती सुनाते हुए बताया कि दस्युओं ने उन्हं बांधकर रखा। हालांकि उन्हें शारीरिक यातनाएं नहीं दी गईं लेकिन हमेशा बंदूक के साये में वे मानसिक तौर पर बुरी तरह आतंकि त रहे। युवा ट्रेनी अफसर बराडकर ने बताया, ‘समुद्री लुटेरों की संख्या करीब 30 थी। उनमें अधिकांश लोग ड्रग एडिक्ट थे। हम सभी 22 क्रू-मेंबरों को अज्ञात स्थान पर बांधकर रखा गया था जहां हथियारों स लैस 20-25 लुटर हर पल हम पर नजर रखत थे। हमें 30 बाई 40 फुट क एक कमर मं रखा गया था और बहुत खराब खाना दिया जाता था जिस हम जीवित रहन भर क लिए खाते थे। जहाज के हेड कुक एस्टेडोर फर्नाडीस ने बताया कि बंधक बनने के बाद उन्होंने नौ दिन तक लुटेरों के लिए खाना बनाया। उन्होंने बताया कि इस पूरी अवधि के दौरान वह किसी तरह मैनेज कर एक-दो मौकों पर भारत में अपने परिवार से संपर्क साधने में सफल हुए। एलिस्टेयर फर्नाडीज ने बताया कि हम स्नान के लिए भी अकेले नहीं जा सकते थे। कड़ी निगरानी के बीच हमें दो-दो की संख्या में बाथरूम भेजा जाता था।ं

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