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तेल के खेल

पेट्रोल-डीाल के दाम घटाने के मुद्दे पर सरकार का रुख उतना ही उलझा हुआ है जितना कि प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा का। सरकार ने इस घोषणा से मैदान मारने की कोशिश की है कि 24 दिसंबर को चुनाव आचार संहिता के निष्प्रभावी होने के बाद वह तेल के दाम घटा देगी। लेकिन वह यह नहीं बता रही कि उसे दाम घटाने की सुध आचार संहिता लागू होने से पहले क्यों नहीं आई क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कीमतें तो कई महीने से उतार पर थीं! अगर असली मकसद एक लाख करोड़ रुपये की अंडररिकवरी से दबी ऑयल कंपनियों पर एक महीना और मरहम लगाने का है तो इस तथ्य को साहस से क्यों नहीं परोसा जाता? सवाल यह भी है कि क्या चुनाव आयोग की पंचायत में यह साबित करना वाकई इतना मुश्किल है कि मौजूदा मंदी में दाम कटौती उपभोक्ता और अर्थतंत्र दोनों के हित में है? फिर अगर कटौती से संहिता का उल्लंघन होता है तो क्या कटौती की घोषणा से नहीं होता? क्या आयोग और जनता दोनों के लिए वह स्थिति ज्यादा आपत्तिजनक नहीं जिसमें पेट्रोल-डीाल के दाम वास्तव में घटें भी नहीं और महा ऐलान के बूते यूपीए चुनावी फायदा लूट ले जाए? और कहीं ऐसा तो नहीं कि असली मंशा दाम कटौती को लोकसभा चुनाव के ज्यादा से ज्यादा निकट भेजने की हो ताकि सही मौके पर सही लोकलुभावन फसल काटी जा सके? सरकार का रवैया अगर गोरखधंधे वाला है तो भाजपा की मुद्राएं विदूषकों जसी हैं। रविवार को पार्टी महासचिव अरुण जेटली मांग कर रहे थे कि सरकार को फौरन तेल कीमतें घटाने की घोषणा करनी चाहिए। मंगलवार को जब देवड़ा ने बाकायदा तिथि बताते हुए घोषणा कर दी तो प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद कह रहे हैं कि इस घोषणा पर चुनाव आयोग को कार्रवाई करनी चाहिए। बेहतर हो भाजपा तय कर ले कि उसे महंगाई की मारी पब्लिक की ज्यादा फिक्र है या चुनाव आचार संहिता की। चट भी मेरी, पट भी मेरी वाले रवैये से बात नहीं बनेगी। कुल मिलाकर सच यह है कि इस मुल्क में नामुराद तेल के दाम अर्थनीति से नहीं, राजनीति से तय होते हैं। अर्थनीति कहती है कि घरलू कीमतें अंतरराष्ट्रीय खरीद मूल्य के हिसाब से तुरंत घटने या बढ़ने चाहिए। लेकिन जो राजनीति विश्व मूल्यों में वृद्धि के बावजूद घरलू कीमतों को बढ़ने से रोकती है, वही उसे घटने से भी रोकती है। देवड़ाओं और जेटलियों के ताजा बयान इसी की मिसालें हैं।

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