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रोशनी पर अंधेर का हमला

देर रात गए निद्राहीन देशवासी क्षत-विक्षत मुंबई की वे छवियॉं देखते रहे, जो मानो नायपाल की पुस्तक का शीर्षक साकार कर रही थीं- ‘भारत, एक घायल सभ्यता’ (इंडिया, ए वूंडेड सिविलाइÊोशन)।़ वी.टी.स्टेशन, ताज, ओबरॉय, नरीमन पॉइंट, हर जगह नीम-रोशनी में नहाए उद्भ्रांत, सहमे चेहर, खून कॉंपते सहारा देते हाथ और पुलिसिया सायरन थे। यह आतंकी हमला नहीं, एक शक्ित बनकर उभर रहे भारत के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद द्वारा युद्ध की घोषणा है। इससे देश को वैसे ही जूझना होगा। टुकड़ा-टुकड़ा नहीं, समवेत रूप से युयुत्सु और एकदिल होकर। यह आश्वस्तिकारक था, कि सोनिया गॉंधी ही नहीं, विपक्ष के नेता आडवाणी ने भी इस घड़ी चुनावी राजनीति के मुहावरों से किनारा करते हुए देश से एकाुटता और दृढ़ता दिखाने का आग्रह किया।ड्ढr हम सब, जिनमें वे भी शामिल हैं, जो कई बार देश के राज-समाज से खुद को विस्थापित-निर्वासित महसूस करते रहते हैं, जिनका भारत के विविधता भर राज्यों, भाषाओं, संप्रदायों से लगाव और अलगाव का मिला-ाुला सा रिश्ता रहता आया है, जिन्हें जड़ों से विच्छिन्न प्रवासी होने की यातना कचोटती रहती है- के लिए यह वक्त सच्चे निर्मल मन से देश की नियति का निष्पक्ष आकलन करने और निर्भय होकर उसे बचाने और उसकी मुख्यधारा का जीवंत हिस्सा बनने की घड़ी है। देश ही नहीं रहा तो हम भी हिन्दू, मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई बन कर कब तक बचे रहेंगे? देश की अखंडता की रक्षा में जिन रखवालों ने अपनी जान गॅंवाई, उनको हम विनम्रता से प्रणाम करते हैं।

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