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संवैधानिक दर्जे वाले लोकपाल को कैबिनेट की मंजूरी

संवैधानिक दर्जे वाले लोकपाल को कैबिनेट की मंजूरी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को संवैधानिक दर्जे के साथ लोकपाल के गठन के लिए ऐतिहासिक विधेयक को मंजूरी प्रदान की जिसके दायरे में सीबीआई नहीं होगी लेकिन कुछ एहतियातों के साथ प्रधानमंत्री के पद को इसके अधीन लाया जाएगा।

सीबीआई को लोकपाल के अधीन लाने की अन्ना हजारे की मांग को नहीं मानते हुए सरकार ने सीबीआई से अभियोजन निदेशालय अलग नहीं करने का भी निर्णय लिया है। मंत्रियों के एक समूह और अधिकारियों द्वारा दो दिन तक विधेयक के मसौदे पर गंभीर मंथन के बाद संविधान (संशोधन) विधेयक के नए मसौदे को आज करीब 70 मिनट तक चली कैबिनेट की विशेष बैठक में मंजूरी दे दी गई।

विधेयक गुरुवार को लोकसभा में पेश किया जाएगा और अगस्त में पेश किए जा चुके मौजूदा विधेयक को वापस ले लिया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि लोकपाल की संस्था नौ सदस्यीय होगी जिसमें एक अध्यक्ष होगा। अध्यक्ष का चयन प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा मनोनीत उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश की चार सदस्यीय समिति करेगी।

विधेयक में प्रधानमंत्री को कुछ एहतियातों के साथ लोकपाल के दायरे में लाने का प्रावधान है। इनमें अंतरराष्ट्रीय संबंध, सरकारी व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, आंतरिक और बाहरी सुरक्षा जैसे विषयों को जांच के दायरे से बाहर रखा जाना प्रस्तावित है।

प्रधानमंत्री के खिलाफ किसी शिकायत पर जांच का फैसला पूरी पीठ करेगी जिसमें से कम से कम तीन-चौथाई सदस्यों की सहमति जरूरी होगी। जांच बंद कमरे में होगी और यदि शिकायत खारिज की जाती है तो रिकार्ड सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे।

सूत्रों ने कहा कि सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग तो नहीं मानी गयी है लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया है जिसके तहत प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश की समिति सीबीआई निदेशक का चयन करेगी। तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने की टीम अन्ना की एक और अहम मांग मंजूर नहीं की गई है।

समूह सी के कर्मचारी लोकपाल के सीधे तौर पर दायरे में नहीं होंगे लेकिन केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की निगरानी में होंगे जो लोकपाल को रिपोर्ट करेगा। सीबीआई में एसपी और ऊपर के दर्जे के अधिकारियों की नियुक्ति सीवीसी, सतर्कता आयुक्तों, गृह सचिव और डीओपीटी के सचिव की समिति करेगी। लोकपाल स्वत: संज्ञान लेते हुए कोई जांच शुरू नहीं कर सकता और उसके लिए शिकायत जरूरी होगी।

जांच प्रकोष्ठ की अगुवाई एक निदेशक करेगा जो प्रारंभिक जांच करेगा। लोकपाल सीबीआई से प्रारंभिक जांच करने के लिए भी कह सकता है जो 180 दिन में पूरी होनी चाहिए। आदर्श स्थिति में प्रारंभिक जांच 90 दिन के भीतर पूरी होनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर इसकी अवधि बढ़ाने की मांग लिखित में की जानी चाहिए।

सीबीआई को भेजे गए मामलों में वह लोकपाल को रिपोर्ट देगी। लोकपाल की पीठ के कम से कम तीन सदस्य रिपोर्ट का अध्ययन करके निर्णय लेंगे कि आरोपपत्र दाखिल किया जाए या समाप्ति रिपोर्ट दाखिल की जाए अथवा विभागीय जांच की सिफारिश की जाए। यदि आरोपपत्र दाखिल किया जाता है तो लोकपाल की अभियोजन इकाई एक विशेष अदालत में कार्यवाही शुरू करेगी। लोकपाल के निर्देशों के तहत किसी अधिकारी की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।

लोकपाल का कार्यकाल पांच साल का होगा और इसके अध्यक्ष या सदस्य पर कम से कम 100 सांसदों के प्रस्ताव के बाद ही महाभियोग चलाया जा सकेगा। सरकार ने मूल मसौदे से हटते हुए लोकपाल की पीठ में और उसकी पड़ताल समिति (सर्च कमेटी) में अनुसूचित जाति-जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव दिया है। सूत्रों ने कहा कि पीठ के आधे सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से होंगे।

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