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किंग खान बने अतिथि संपादक

किंग खान बने अतिथि संपादक

सामने बिखरी हिन्दुस्तान की फाइलें, हाथ में खबरों की फेहरिस्त और हर खबर पर पैनी नजर। हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग की टीम अतिथि संपादक के रूप में शाहरुख खान का यह अंदाज देख हैरत में थी।

किंग खान अनुभवी संपादक की तरह सतर्क थे। कोई खबर कहां लें -कैसे लें, क्यों लें-क्यों नहीं, इसके पर्याप्त तर्क थे उनके पास। लीड लोकपाल की खबर करें पर ध्यान रहे तथ्यों से परे न बहें। पूरे पन्ने की खबरें छांटकर पूछे-क्या ख्याल है। एक सज्जन बेसाख्ता बोल उठे- संपादक बनने की मत सोचिएगा, हमारे लिए मुश्किल हो जाएगी। उनका जवाब हाजिर था ‘पैसा दो ठीक-ठाक, सोचूंगा।’

अब वह हिन्दुस्तान पलट रहे थे। बोले ‘अच्छा अखबार है, यूथ के लिए क्यों नहीं सोचते? कुछ पन्ने सिर्फ उनके लिए रखें।’ विदेशी खबरों के न होने से दुखी दिखे। खेल के दो पन्ने देखकर बोले- कवरेज अच्छा है, विशेषज्ञों की टिप्पणी हो तो बेहतर। वह अब फोटो पर उतर आए। कहा ‘कोई गुजर गया हो और बाप रो रहा हो तो आंसुओं से भीगा चेहरा छापने का सब्जेक्ट नहीं। उसे बख्श दो!’

दरअसल, एक अनोखा अहसास था किंग खान को अखबारी दुनिया से पाबस्ता देखना। पेश है आज के हिन्दुस्तान का पहला पन्ना शाहरुख की पसंदीदा खबरों के साथ।

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