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बेहतर इलाज के अभाव में नवजातों खतरे में

जिले में अभी भी हर महीने कई नवजात सही इलाज और बेहतर देखभाल नहीं मिलने के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। जिले के रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम से मिले आंकड़ों पर गौर करें तो ग्रामीण इलाकों में इस साल अब तक 61 से अधिक नवजातों की किसी ना किसी वजह से जान जा चुकी है। इनमें जन्म के दो घंटे से लेकर एक सप्ताह तक के बच्चे शामिल हैं। इसके विपरीत हर साल सैकड़ों ऐसे शिशु हैं जिनकी मौत के आंकड़े विभाग के पास दर्ज ही नहीं हो पाते हैं।

जिले के ग्रामीणों इलाकों में नवजातों की मौत का सिलसिला जारी है। प्रदेश में एक हजार जीवित शिशुओं पर नवजात शिशुओं की मृत्यु दर 51 है। जबकि जिले में यह दर इससे थोड़ी अधिक है। माता एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए राज्य सरकार की ओर से जिलों में वैब आधारित निगरानी प्रणाली शुरू की गई है। इसके जरिए हर जिले में शिशु मृत्यु दर का सही अनुमान लगाने के लिए  स्वास्थ्य विभाग से तो आंकड़े लिए ही जा रहे हैं। इसके अलावा आंगनबाड़ी कार्यकत्र्ताओं, आशा वर्कर, एएनएम का सहयोग लिया जा रहा है। इन्हीं के जरिए रेफरल ट्रांसपोर्ट सेवा को जिले में इस साल 61 बच्चों की मौत की जानकारी मिली है। सूचना देने के लिए वर्करों को 100 रुपये प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।

क्या थी वजह
- समय से पहले जन्म
- सांस लेने में दिक्कत
- वजन कम होना
- समय पर इलाज नहीं मिल पाना
- घर पर शिशु का जन्म होना
प्रदेश में मृत्यु दर 51
स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश में 1000 जीवित बच्चाों के विरूद्घ नवजात शिशुओं की मृत्यु दर 51 है। यह राष्ट्रीय दर से अधिक है। इसमें हरियाणा पूरे देश में 27वें पायदान पर है जो कि चिंता का विषय है।

30 पर लाना लक्ष्य
जिले के डिप्टी सिविल सजर्न डॉ. वी. के. सिंघल कहते हैं कि जन्म के बाद शिशुओं की मौत के कई कारण हो सकते हैं। जिले में संस्थागत डिलीवरी को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को विभाग की ओर से जागरुक किया जा रहा है। इस समय जिले में संस्थागत डिलीवरी की दर 90 फीसदी तक पहुंच गई है। उनके अनुसार राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का लक्ष्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर को वर्ष 2012 तक 51 से घटाकर 30 पर लाना है।
 
स्तनपान से 25 फीसदी आती है कमी
शोधानुसार नवजात शिशु को 6 महीने तक केवल मां का दूध पिलाने से शिशु-मृत्यु दर में 20 से 25 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ व आंगनबाड़ी कार्यकत्र्ताओं को महिलाओं को इस बारे में जागरूक करने को कहा गया है।

महीना  मौत
फरवरी  3
मई  1
जून   6
जुलाई  3
अगस्त  12
सितंबर  20
अक्टूबर  9
दिसंबर  7
रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम से मिले आंकड़ों के आधार पर

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