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नवादा के ढाव में छाया है मातम

0 गांवों की बस्ती ढाव में मातमी सन्नाटा। परिजनों का क्रंदन। महिलाओं की चीत्कार। जार-जार होती मां। काले बुधवार का ग्रास बने सरबली उद्दीन (60 वर्ष) का परिवार आतंकियों के क्रूर कारनामों का गवाह बना हुआ है। अधेड़ उम्र में जब पति का साया उठा तो बेटों ने परिवार का बोझ अल्प आयु में ही अपने कंधे पर ले लिया। पर सवरा खातून को क्या पता था अल्लाह इतने नाराज हैं।ड्ढr ड्ढr बेटों की लाठी भी टूट गई। दोनों बेटे बकरीदपर अम्मी जान से मिलने नवादा स्थित ढाव आ रहे थे। पर खुदा को प्यार हो गये। सरबली के सीने में और भी कई दर्द उभर हैं। पोतों के अलावा बेटा, बेटी, दामाद और नतिन दामाद भी आतंकियों के शिकार हुए हैं। इन जख्मों ने सरबली को बुत बनाकर रख दिया है। ढाव में मृतक दोनों भाइयों के दादा एवं मृतक इलियास के 80 वर्षीय पिता साहब अली एवं मां सवरा खातून घर के बरामदे पर आने-जाने वाले लोगों को टुकुर-टुकुर देख रही है। मृतक भाइयों की मां एवं बहन बेसुध पड़ी है। बस अपने बेटे को देखने की रट लगाये हुई है। मां की स्थिति देख आस पास के गांव के लोगों की आंखों से आंसुओं के सैलाब निकल रहे हैं। अपने सीने में बाप की मौत का दर्द लिए अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए नन्हा मुस्तफा और मुतरुजा ने मुंबई की राह ली थी।ड्ढr ड्ढr ट्रकर दुर्घटना में बाप के साया उठ जाने के बाद विधवा मां एवं बहनों का पेट पालने के लिए कोई साधन नहीं था। इन दोनों भाइयों के कमजोर कंधे पर घर चलाने की जिम्मेवारी आ पड़ी थी। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। क्योंकि बाप की मौत के सात माह के बाद ही देश के काले बुधवार ने इन दो सगे भाइयों सहित एक ही परिवार के छह रिश्तेदार मौत की आगोश में समा गये। मुंबई गये इलियास हुसैन के साथ रहकर हस्तकरघा का काम की ट्रनिंग ले रहे मुस्तफा एवं मुतरुजा आगामी दिसम्बर के बकरीद मनाने के लिए चाचा और फूफा-फूफी के साथ ढाव गांव आने के लिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनल रलवे स्टेशन पहुंचा थे। जहां वे आतंकवादियों की गोलियों के शिकार बन गये।

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