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धर्म और पुण्य कमाने का सच

वयस्क लोगों को खाना देने की योजना में सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं है और यह काम आमतौर पर धार्मिक संगठनों के हवाले ही है। लेकिन ऐसे बहुत कम ही संगठन हैं, जो गरीबों को पूर्ण आहार देते हैं और उनके साथ सम्मान के साथ पेश आते हैं।

हमारे शहरों में पलायन करके आई बेघर आबादी की सबसे बड़ी जरूरत है सस्ता खाना, जो पौष्टिक भी हो और संपूर्ण आहार भी। जाहिर है, इनमें से ज्यादातर लोगों के पास खाना पकाने की कोई व्यवस्था नहीं होती। भोजन के लिए वे अपनी आमदनी का एक तिहाई से लेकर तीन चौथाई तक हिस्सा हर रोज ठेलों और ढाबों से खाना खरीदने में खर्च कर देते हैं।

दुनिया के कई शहरों में इस तरह की रसोइयां चलती हैं, लेकिन अपने देश में तमिलनाडु को छोड़ दें, तो कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं है, जहां राज्य सरकार वयस्कों को मुफ्त या रियायती दरों पर खाना उपलब्ध कराती हो। ऐसा भोजन इस विस्थापित आबादी को स्वस्थ रखता है और उनका पैसा भी बचता है, जिससे वे अपनी बाकी दरिद्रता को कुछ कम कर सकते हैं। रियायती दर पर भोजन उपलब्ध कराने की योजना में सरकारें निवेश नहीं करती हैं, तो इसके पीछे सोच यह है कि कई निजी और धार्मिक संगठन इस काम को कर रहे हैं। इसे देखते हुए हमने सोचा कि दिल्ली में ऐसे भोजन देने वाले धार्मिक संगठनों के आयोजनों का जायजा लिया जाए।

हमने पाया कि सिर्फ चार प्रतिशत बेघर लोग ही इस तरह के भोजन पर निर्भर हैं। इनमें भी असहाय बेघर लोग, विकलांग और बूढ़े, लावरिस युवा बच्चों, यानी वे सब शामिल हैं, जिनकी आमदनी का कोई पक्का जरिया नहीं है और वे दान या भीख पर ही निर्भर हैं। कामकाजी बेघर लोग भी कभी-कभी इन जगहों पर भोजन के लिए जाते हैं, लेकिन तभी, जब आर्थिक स्थिति वाकई बहुत खराब हो और उनके पास भोजन खरीदने तक के पैसे न बचे हों।

भूखे को भोजन कराना हिन्दुस्तान की सभी धार्मिक परंपराओं में काफी पुण्य का काम माना गया है। लेकिन हमने पाया कि 21वीं सदी की चमचमाती दिल्ली में इस परंपरा का हाल बहुत अच्छा नहीं है। हमें हैरत हुई कि दिल्ली में किसी चर्च के पास बेसहारा लोगों को भोजन कराने की कोई व्यवस्था नहीं है। दूसरे धार्मिक संगठन कुछ हद तक ऐसे कार्यक्रम चलाते हैं, लेकिन कुछ ही हैं, जो इन बेघर लोगों की वास्तविक जरूरतों का ध्यान रखते हैं। अक्सर उन्हें संपूर्ण आहार नहीं मिलता और जो मिलता है, वह सम्मान के साथ नहीं दिया जाता।

हमारी उत्सुकता यह जानने में थी कि इतने कम बेघर लोग इस भोजन पर निर्भर क्यों हैं, क्यों वे अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च कर देते हैं, या फिर कभी-कभी भूखे ही रह जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण तो यह है कि इस तरह का भोजन कहीं-कहीं ही मिलता है और अक्सर यह वैसा संपूर्ण आहार नहीं होता, जैसी उनकी जरूरत है। भोजन कब मिलेगा, कितना मिलेगा और किस तरह का मिलेगा, यह दान करने वाले की इच्छा पर निर्भर है, बेघर लोगों की जरूरतों पर नहीं। इसके लंबे इंतजार का अर्थ है काम का हर्जा करना। इन बेघर लोगों में कई दैनिक मजादूर होते हैं, जिन्हें इस उम्मीद में सुबह ही लेबर चौक पर पहुंच जाना होता है कि उन्हें दिन भर के लिए काम मिल सके।

कई हिंदू मंदिरों में भंडारे या प्रसाद वितरण वगैरह का आयोजन होता है, लेकिन एक तो यह निश्चित दिनों पर ही होता है और दूसरा, इसे बनाने में बहुत ज्यादा तेल या घी का इस्तेमाल होता है, या यह सिर्फ मीठा ही होता है। बस हरे कृष्णा मंदिर ही इसका एक अच्छा अपवाद है। बाकी जगहों पर दानदाता को पुण्य चाहिए, उसकी दिलचस्पी दान पाने वाले की जरूरतों में नहीं होती। कई बार बेघर लोग ऐसे खाने से उकता जाते हैं, उनकी इच्छा साधारण और सुपाच्य भोजन की होती है।

लेकिन असली कारण जिसकी वजह से बेघर और विस्थापित लोग इस तरह का भोजन पसंद नहीं करते, वह है उनके आत्म सम्मान का आहत होना। इसे पाने के लिए उन्हें जूझना पड़ता है और फुटपाथ पर पेड़ के नीचे बैठकर खाना होता है। अक्सर इस तरह दिया जाने वाला भोजन सीमित होता है और उसे पाने के लिए भगदड़ जैसी स्थिति हो जाती है, कई बूढ़े और लाचार गिरकर चोट भी खा जाते हैं। निजामुद्दीन दरगाह और साईं बाबा का मंदिर, हमें दो ही जगह ऐसी मिली, जहां उन्हें सम्मान के साथ भोजन दिया जाता है। यहां दान दाता किसी होटल से खाने के टोकन खरीद लेते हैं, फिर ये टोकन बेसहारा लोगों में बांट दिए जाते हैं। इन टोकन का इस्तेमाल एक महीने तक किया जा सकता है। बाद में ये लोग उस जगह जाकर  टोकन की कीमत का मनपंसद भोजन खरीद सकते हैं। इसके विपरीत जामा मस्जिद में जो तरीका अपनाया जाता है, वह उतना सम्मानजनक नहीं है। वहां बेसहारा लोग मस्जिद के पास बने होटलों के बाहर कतार बांधे बैठे रहते हैं, इस इंतजार में कि कोई दानदाता आकर ढाबे वाले को पैसे देकर उन्हें भोजन देने के लिए कहेगा।

परंपरागत तौर पर सबसे संपूर्ण आहार सिख गुरुद्वारों के लंगर में दिया जाता है। वहां लोग जमीन पर बिछी दरियों में एक साथ पंगत बनाकर बैठ जाते हैं और उन्हें जितना जरूरत हो,भोजन दिया जाता है। लंगर सिख धर्म का एक केंद्रीय तत्व है, जिसमें राजा और रंक सभी को एक साथ बैठकर, एक ही भोजन, एक ही जैसे सम्मान भाव के साथ दिया जाता है। लेकिन हमने पाया कि राजधानी के गुरुद्वारों ने इस परंपरा को छोड़ दिया है। गुरुद्वारा शीशगंज साहिब चांदनी चौक के उस हिस्से में है, जहां आस-पास बेघर लोगों की भारी तादाद है। लेकिन यहां उन गरीबों को लंगर में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, जो गंदे दिखते हैं। कनॉट प्लेस के पास बंगला साहिब गुरुद्वारे में भी उन्हें लंगर में जाने से रोका जाता है। इसके बजाय उन्हें गुरुद्वारे के पीछे बाहर की तरफ लंगर दिया जाता है। हां, उन्हें भोजन वही दिया जाता है, जो बाकी सबको मिलता है, लेकिन सम्मान वही नहीं होता। हमने जब इस सिख परंपरा को छोड़ देने के बारे में मैनेजर से बात की, तो उनका कहना था कि ऐसे लोग बीड़ी-सिगरेट और शराब वगैरह पीते हैं और उनकी वजह से गुरुद्वारा अपवित्र होता है।

धार्मिक संगठनों के लंगर, भंडारे वगैरह की हमारी यह पड़ताल एक मायने में महत्वपूर्ण रही। इसने हमें बताया कि मध्य वर्ग के दिल में बेसहारा और बेघर लोगों के लिए क्या जगह है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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