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आखिरी जेंटिलमैन

हिंदी कवि कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ दिया गया। अच्छा लगा। बुरा भी लगा। वक्त ऐसा कमबख्त आन पड़ा है कि अच्छा बुरा और बुरा अच्छा लगता है। हमें तो अच्छा इसलिए लगा है कि कुंवर नारायण में कोई ‘साहित्यिक ऐब’ नहीं है। अगर है तो जाना नहीं जाता। जिस समय में साहित्यक ऐब कुटेबों में बदल गए हों और कुंवर जी के हमउम्र तक साहित्य की ठगी और उठाईगीरी में व्यस्त हों उस समय कोई एक आदमी और जो भी हिंदी में टूट फूट से साबुत बचा रह गया है यह अपने आप में किसी बड़े अचरज स कम नहीं। शायद यह बात अपने भीतर भी कुछ विनम्रता और उदात्तता लान का रस्ता खोलती है। सम्मानों के मानकों के बारे में ज्यादा कहना देवनिंदा के समान है। हर सम्मान अपनी ‘देन की शर्म’ छिपाता है जिसे अक्सर वह सर्वानुमति कहता है। सम्मान देने वाले अपनी कथित सहमतियों में अपनी आफत से पिंड छुड़ाते हैं। हमारे मत में वो इनाम ही क्या जिसे देकर देने वाला गर्व न करे और लेने वाला शर्म न करे। अपने दिल की कोई न कहे ़इन दिनों तो शर्म करना तक गर्व करन की तरह होता है! यह लेखक जा कुंवरनारायण की कविताओं का ‘आलसो’ प्रश्ांसक है। यही कह सकता है कि वह उनकी कविताओं से भी ज्यादा उनके व्यक्ितत्व का प्रशंसक है़ बिना किसी कारण वे एक भलेमानुस से लगते हैं। यह बुरी बात है मगर यह लेखक भी आदत से लाचार है। न उनसे मुलाकात है न उनके संग संध्या सत्संग है। वे इस लायक भी नहीं कि उनकी भक्ित की जाए। उनका पानी तक नहीं पिया। मुश्किल से दो-तीन नमस्कार भर होंगे अपनी तरपफ से जो उनके सामने पड़ने पर संचारित हुए होंगे। उनकी कविताएं दिल्ली विश्वविद्यालय के इस ‘चिरनिंदित’ हिंदी विभाग के पाठय़क्रम में लगी हैं। पढ़नी पढ़ानी होती है। वे काम की हैं। वे इम्तहान में आती हैं। सवाल बनती हैं। जवाब दिए जाते हैं। बस इतना ही परिचय है उनसे। कुंवर नारायण को सम्मान दिया जाना यहीं बुरा लगता है। भाई जी इतना भी साफ सुथरा नहीं होना चाहिए। संदेह होता है। नजरौटा लगा लें कुवर जी! यहीं से इस सम्मान का अपना अच्छा-बुरा सा अर्थ बनता है। यह सम्मान जब एक आखिरी भलेमानुस, हिंदी के आखिरी जेंटिलमैन कुंवर नारायण को दे ही दिया गया है तो इस नीच की एक अतिकमीनी इच्छा यह हो रही है कि आग के तमाम सम्मानों के लिए एक फंसट लगाए। भलमानुस या मानुसी होने की फंसट! आग के सम्मानों में रचना के साथ साहित्यकार का भलमानुसपन मूल्यांकन भी होना चाहिए! सब साहित्यकार नित्य मानते हैं कि समय पतनशील है साहित्य ही अकेला ऐसा इलाका है जहां साहित्यकार कुछ मानवता कुछ मानवीय मूल्य बचाए रखता है। जब साहित्यकार इतना भला काम करता है तो जरूर वह भले मानुसों का काम होगा। क्यों न उसके व्यक्ितत्व का मूल्यांकन भी होने लगे। आग के सम्मानों में साहित्यकार का बायडाटा रहे। उससे यह मांगा जाए कि उसकी आय कितनी है और टैक्स देता है तो कितना? कितनी पत्नियां हैं। कितने लावारिस या वारिस बालक हैं, कहां क्या करते हैं उन्हें ता कोई शिकायत नहीं हैं और पड़ोसी को तो आपसे कोई शिकायत नहीं है। आप वोट देते हैं या पप्पू हैं। आप लालची हैं या त्यागी हैं। आपने तिकड़म कब और किस श्रेणी की की है और क्यों की है। आत्मकथा में कितना झूठ मारा है। लिखन के पहले या बाद में आपको कभी पश्चाताप होता है? आप आस्तिक हैं या नास्तिक? इस तरह की एक प्रश्नावली होनी चाहिए जिसे हर लेखक खुद भरे और उसमें शपथ ले कि जा कह रहा है, सही कह रहा है गलत पाए जाने पर उस कमेटी से और इनाम बाहर माना जाए। या उसके इनाम राशि में स कुछ काट लिया जाए। छोटी बेईमानी करने वाल को अगले इनामों के लिए दो-चार साल के लिए बाहर कर दिया जाना चाहिएोो साहित्य के दस नंबरी हैं उन्हें कमेटियों तक में नही आने देना चाहिए। साहित्य के इस जनताप्रिय युग में कमेटियों में ट्रेडयूनियनों के लेाग किसान सभाओं के लोग रहें। साहित्यिक इच्छाएं न रखने वाले अध्यापक रहें। अध्यापक जरूर रहें क्योंकि इस दुष्टता भरे समय में सच्चा गुरु ही न्याय कर सकता है। जनता से जुड़ाव का गाना गाने वाले साहित्यकारों को कम से कम जनता के लेवल का सम्मान ता करना ही होगा अगर साहित्य समाज से जुड़ा है तो समाज के सबस कमजोर तबकों के मानक का सम्मान करना होगा और उन्हें कमेटियों में रखना होगा। देश की जनता नेताओं में एक भी भलामानुस ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थक गई। क्या पता साहित्यकारों के बीच उसे आशा की किरन नजर आए। उसे भलामानुस मिल जाए। साहित्य की जीवनरक्षा के लिए भी ऐसा करना जरूरी है कि कुछ दिन साहित्यकारों में जेंटिलमैन खोजे जाएं, भले एकाबरगी उनका साहित्य न पढ़ा जाए।

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