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अस्पताल में आग

कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में लगी भीषण आग यह बताती है कि लापरवाही के मामले में भारत के अमीर और गरीब इलाकों में कुछ खास फर्क नहीं है। एएमआरआई अस्पताल बेहद महंगा और आलीशान अस्पताल है, जहां इलाज में लाखों रुपये लग जाना कोई खास बात नहीं है, लेकिन यह साफ है कि आग से बचने के उसमें पुख्ता इंतजाम नहीं थे।

इसके पहले भी कोलकाता की भीषणतम आग एक बेहद समृद्ध इलाके की आवासीय इमारत में लगी थी, जिसके मालिकों ने ऊपर की दो मंजिलें अवैध रूप से बनाई थीं और ज्यादातर मरने या जख्मी होने वाले इन्हीं मंजिलों पर रहते थे। देश के हर शहर में ऐसी सैकड़ों पुरानी इमारतें मिल जाएंगी, जिनमें इस तरह से अवैध निर्माण हुए हैं कि वे जीता-जागता टाइम बम बन गई हैं, उनसे भी ज्यादा ऐसी नई इमारतें मिल जाएंगी, जिन्हें बनाने में सुरक्षा का कोई ख्याल नहीं रखा गया है।

एएमआरआई अस्पताल कोई पुराना अस्पताल नहीं है, लेकिन देश में ऐसे अस्पताल शायद ही देखने को मिलें, जिनके निर्माण में आग या किसी अन्य दुर्घटना से सुरक्षा का ख्याल रखा गया हो। पुराने अस्पताल फिर भी खुले, हवादार और बड़े-बड़े गलियारों व सीढ़ियों वाले मिल जाएंगे, लेकिन जो नए अस्पताल हैं, उनमें कम से कम जगह में ज्यादा से ज्यादा कमरे बनाने के लिए गलियारों और सीढ़ियों को भूल-भुलैया की तरह संकरा और टेढ़ा बना दिया गया है।

एएमआरआई अस्पताल आग लगने की वजह से चर्चा में आ गया, लेकिन लगभग सभी अस्पतालों में परिस्थितयां वैसी ही हैं। यह लापरवाही सिर्फ अस्पताल के मालिकों, प्रशासकों या सरकार की नहीं है, हमारे समाज में भी दुर्घटना से बचाव के लिए कुछ जगह या पैसा छोड़ना अपव्यय माना जाता है।

एएमआरआई अस्पताल पर यह आरोप है कि उसके भूतल में दवाइयां, ऑक्सीजन सिलिंडर, रसायन वगैरह रखे गए थे, जिनसे आग भड़की थी, देश के तकरीबन सभी निजी अस्पतालों में बाह्य मरीज विभाग, दवा घर, भंडार गृह भूतल पर ही होता है। इस बात की हम आमतौर पर अनदेखी ही करते हैं। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि इस दुर्घटना के बाद भी दूसरे अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था बदलेगी।

दिल्ली, मुंबई, बल्कि देश के हर शहर से नियमित रूप से इमारतों के गिरने की खबरें आती रहती हैं, किंतु न निर्माण का स्तर सुधरा, न निगरानी का। हम सबक नहीं लेते, इसलिए इतिहास को दुहराने के लिए बाध्य होते हैं।

एएमआरआई अस्पताल के जिस खंड में आग से मौतें हुई हैं, उनमें अस्थि रोग विभाग और आईसीयू वगैरह थे। यानी वे ऐसे मरीज थे, जो आग लगने पर भाग नहीं सकते थे। मौके पर मौजूद लोगों के जो बयान आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि अस्पताल के कर्मचारियों को इस बात की कोई ट्रेनिंग नहीं थी कि ऐसी आपदा के समय उन्हें क्या करना है। भारत के अस्पतालों में मरीज के साथ देखभाल करने वाले भी होते हैं। अस्पताल कर्मचारी समझदार होते, तो परिजनों के साथ मिलकर काफी मरीजों को बचा सकते थे।

उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि मरने वालों में ज्यादा मरीज थे और शुरुआती बचाव करने वाले आसपास के लोग थे। यह भी एक तथ्य है कि पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है, जहां काफी वक्त से अग्निशमन विभाग का अलग मंत्री होता है, लेकिन रोकथाम हो या अग्निशमन हो, पश्चिम बंगाल का रिकॉर्ड उतना ही अच्छा या बुरा है, जितना किसी और राज्य का।

अभी कुछ दिनों तक नए-नए तथ्य आएंगे, दोषियों की फेहरिस्त बनेगी, आरोप-प्रत्यारोप होंगे, लेकिन क्या हम इस दुर्घटना से कुछ सबक लेंगे? अगर हमने सुरक्षा के लिए पहले से थोड़ा निवेश करना नहीं सीखा, तो फिर हर बार हम बड़ी कीमत चुकाते रहेंगे।

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