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लोकपाल पर समिति की रिपोर्ट राज्यसभा में पेश

लोकपाल पर समिति की रिपोर्ट राज्यसभा में पेश

संसद की स्थायी समिति द्वारा लोकपाल विधेयक पर रिपोर्ट राज्यसभा में पेश कर दिया गया है। समिति की रिपोर्ट राज्यसभा के सामने राजीव शुक्ला ने पेश की।

इस रिपोर्ट में समिति के 30 में से कांग्रेस के तीन सदस्यों समेत 16 ने अपना असहमति नोट लगाया है। ये असहमति के नोट भिन्न-भिन्न मुद्दे हैं। कुछ ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग की है तो कुछ ने ग्रुप सी और डी कर्मचारियों को भी लोकपाल के दायरे में लाने की मांग की गई है।

लोकपाल विधेयक पर बहुप्रतीक्षित संसदीय समिति की रिपोर्ट में अन्ना हजारे के जन लोकपाल विधेयक के तीन प्रमुख मुद्दों से बिल्कुल अलग राह अपनाते हुए सीबीआई तथा समूह सी और डी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की गई है जबकि प्रधानमंत्री को इसके तहत लाने के मामले में तीन विकल्पों के साथ फैसला संसद के सदविवेक पर छोड़ दिया गया है।
   
संसद के दोनों सदनों में शुक्रवार को पेश कार्मिक, लोकशिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय समिति ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने के तीन विकल्प सुझाए हैं। इनके तहत प्रधानमंत्री को बिना किसी विवाद के इसके दायरे से बाहर रखना, प्रधानमंत्री के पद छोड़ने के बाद उस पर कार्रवाई या अभियोग चलाना तथा रक्षा सहित कुछ संवेदनशील विषयों के मामले में प्रधानमंत्री को इसके दायरे से अलग रखने के विकल्प शामिल हैं।
   
रिपोर्ट में सीबीआई को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की गई है। इसमें कहा गया है कि लोकपाल मामले की प्रारंभिक जांच करके आगे की जांच के मकसद से मामला सीबीआई को सौंप देगा। सीबीआई को मामला सौंपे जाने का फैसला कम से कम तीन सदस्य वाली लोकपाल की पीठ करेगी। आरोप तय करने से पहले आरोपी को सुनवाई का पूरा मौका दिया जाएगा।
    
रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्य जांच सीबीआई करेगी और जब तक जांच एजेंसी मामले में आरोपपत्र या मामले को बंद करने संबंधी रिपोर्ट पेश नहीं करती, तब तक उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। सीबीआई की जांच के आधार पर लोकपाल अभियोजन की कार्रवाई चलाएगा। नागरिक अधिकार पत्र के मुद्दे पर समिति ने इस बात की पुरजोर सिफारिश की है कि इसके लिए एक अलग और व्यापक कानून बनाया जाए।
    
सांसदों के आचरण के बारे में समिति ने कहा है कि संविधान का अनुच्छेद 105 पिछले काफी समय से खरा साबित हुआ है और इसका उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति और विभिन्न राजनीतिक दलों में इस मुद्दे पर लगभग सर्व सम्मति होने के मद्देनजर संविधान के इस अनुच्छेद में हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। लोकपाल को संवैधानिक इकाई बनाने की स्थिति में विलंब होने की आशंकाओं को रिपोर्ट में निराधार बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें कोई विलंब नहीं होगा।
   
समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि प्रस्तावित लोकपाल के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक, सांविधिक विधेयक से कहीं अधिक संक्षिप्त है और इसे उसी दिन तथा उसी वक्त बाद में अलग बहुमत से पारित कराया जा सकता है। समिति ने समूह सी और डी के सारे कर्मचारियों को केंद्रीय सतर्कता आयोग के दायरे के तहत लाने की सिफारिश की है। लेकिन राज्यों में इस वर्ग के कर्मचारी लोकायुक्त के दायरे में रहेंगे।
   
समिति के अध्यक्ष अभिषेक मनु सिंघवी ने बाद में संवाददाताओं से कहा कि समिति के समक्ष विचार के लिए करीब 14 मुद्दे थे। समूह सी और डी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने का मामला ही एकमात्र ऐसा मुद्दा था जिस पर सर्वाधिक असहमति जताई गई। इन वर्गों के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश पर समिति के 30 में से 17 सदस्यों ने सहमति जताई जबकि 13 सदस्य इसके खिलाफ थे।
   
सिंघवी ने कहा कि समिति में 13 मुद्दों पर सदस्यों के बीच सर्वसम्मति थी जबकि दस मुद्दों पर एक या दो सदस्य समिति की रिपोर्ट के खिलाफ थे। गलत या फर्जी शिकायतों के बारे में समिति ने सिफारिश की है कि ऐसे मामलों में छह माह की साधारण कैद से अधिक की सजा नहीं होनी चाहिए। साथ ही 25,000 रूपये से अधिक जुर्माना नहीं लगाया जाए। गौरतलब है कि लोकपाल विधेयक में फर्जी या गलत शिकायत पाए जाने पर अधिकतम पांच साल की सजा और पांच लाख रूपये जुर्माने का प्रावधान था।
   
समिति ने न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में नहीं लाने की सिफारिश की है और इसकी जगह व्यापक न्यायिक मानक एवं जवाबदेही विधेयक की सिफारिश की है। लोकपाल का चयन करने वाली समिति में प्रधानमंत्री लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, भारत के प्रधान न्यायाधीश के साथ साथ एक प्रख्यात भारतीय हस्ती को रखने की भी रिपोर्ट में सिफारिश की गई है। इस प्रख्यात भारतीय का चयन भारत के नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक, मुख्य चुनाव आयुक्त और यूपीएससी के अध्यक्ष करेंगे।
   
समिति में लोकपाल का नाम सुक्षाने के लिए एक खोज समिति का भी प्रस्ताव किया गया है। इस समिति में कम से कम सात सदस्य होंगे जिसमें 50 प्रतिशत अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाएं होंगी। समिति ने कहा है कि ऐसी कंपनियों, गैर सरकारी संगठनों और मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए जिनका स्वामित्व या नियंत्रण केंद्र सरकार के तहत आता हो।

तीन कांग्रेसी सांसदों मीनाक्षी नटराजन, दीपादास मुंशी और पी. टी. थॉमस ने केंद्र सरकार के ग्रुप सी कार्मिकों को लोकपाल दायरे में नहीं रखने पर विरोध पत्र दिया है। वहीं, प्रधानमंत्री को दायरे में नहीं रखने पर भाजपा, बीजद, सपा, लोजपा, राजद और वाम दलों के 13 सांसद पहले ही विरोध पत्र दे चुके हैं। लोजपा लोकपाल में आरक्षण की मांग भी कर रही है।

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