अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सीमाओं के पार

भारत में अब तक जो भी आतंकवादी हमले हुए, उनमें मुंबई का ताजा हमला एक अलग किस्म का है। आतंकवादियों के निशाने पर खासकर वे विदेशी नागरिक थे, जो अमेरिका, इजरायल व ब्रिटेन से आए थे। एक प्रमाण यह है कि आतंकियों ने उनसे उनकी नागरिकता पूछकर अमेरिकी, ब्रिटिश तथा इजरायली नागरिकों को बंधक बनाया, जबकि कुछ अन्य देशों के नागरिकों को रिहा कर दिया। इससे इन देशों की सरकारों की चिंता स्वाभाविक है। शायद इसी कारण उन्होंने मुंबई के हमलों की जांच में भारत को अपना सहयोग देने की तीव्र दिलचस्पी दिखाई और उनकी कुछ खुफिया टीमें भारत आ रही हैं। संभव है कि उन्हें आशंका सता रही हो कि उनके मुल्क में किसी भावी बड़े हमले के लिए आतंकियों ने भारत को पहली प्रयोगशाला बनाया। एक ब्रिटिश मूल का पाकिस्तानी पकड़े जाने की खबर पर ब्रिटिश सरकार के कान खड़े हुए हैं। हालांकि यह अपुष्ट है, पर वह उसकी तह में जाकर पता लगाना चाहेगी कि इस आतंकी के अन्य साथी कौन हैं, जो भविष्य में ब्रिटेन को भी हानि पहुंचा सकते हैं। विश्व महाशक्ित और आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान के प्रमुख संचालक के रूप में अमेरिका की दिलचस्पी भी अप्रत्याशित नहीं। इजरायलियों को निशाना बनाने पर भला इजरायल सरकार कैसे चुप बैठ सकती है? बहरहाल, मुंबई में आतंकी हमलों को लेकर दुनिया भर के प्रमुख नेताओं ने भारत के साथ सहानुभूति जताई, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है, जिसके साथ आतंकियों के तार जुड़े हैं। आतंकवाद पर पाक शासक दोहरा खेल खेलते रहे, पर कुछ समय से वे खुद इसके शिकार हुए हैं और अमेरिकी दबाव में वहां की सरकार पश्चिमी सरहदों पर आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। पाक राष्ट्रपति जरदारी जांच में सहयोग देने और आईएसआई के प्रतिनिधि को भेजने के लिए कह रहे हैं तो विशेष आश्चर्य नहीं होना चाहिए, न ही इस पर कि उनके इस प्रस्ताव का पाक सेना ने विरोध किया। भारत को विश्व सहानुभूति का अपने पक्ष में अधिकाधिक उपयोग करना चाहिए। अन्य देशों की मदद से ही आतंक के खिलाफ कोई अधिक ठोस देसी और वैश्विक रणनीति उभर सकती है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: सीमाओं के पार